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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तू ही बस इक अवतारी बलभाय,

Reading 23 of 112 · Source no. 11 · Source PDF 36–38

1तू ही बस इक अवतारी बलभाय,

2और भगवान अवतार कहाय।

3तु ही स्वयं भगवान रसिक बताय,

4और सब अवतार स्वांश कहाय।

5तेरे हैं अनन्त रूप अस श्रुति गाय,

6वैसे ही अनन्त नाम श्रुति बतलाय।

7ज्ञानिन को तेरा रूप ब्रह्म मन भाय,

8योगिन को तू ही परमात्मा लखाय।

9भक्तन प्रिय छवि श्यामा श्याम आय,

10जाको मन भाय यामें वामें मन लाय।

11ब्रह्म में तो शक्ति न्यूनतम प्रकटाय,

12याते वाय रसिकन नहिं अपनाय।

13ब्रह्म रूप पाके ज्ञानी मुक्त ह्वै जाय,

14किन्तु नहिं नाम रूप लीला गुण वाय।

15ब्रह्म रूप अगुण अरूप कहाय,

16याते यह रसिकन नाहिं सुहाय।

17परमात्मा में नाम रूप गुण भाय,

18सोउ लीला परिकर रहित बताय।

19सब रूप षट ऐश्वर्ययुत आय,

20सब सत चित आनँद कहलाय।

21सब में ही सब शक्ति वेद बताय,

22सबते सरस रसयुत बलभाय।

23कृपा आदि गुण में ही अन्तर आय,

24याते तू “कृपालु” जनि मन भरमाय।

25भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे अन्य अवतार तो अवतार हैं

26किन्तु तुम उन अवतारों के अवतारी हो अर्थात् तुम्हारे अतिरिक्त जो

27अवतार हैं वे तुम्हारे स्वांश हैं।

28ऐसा रसिक जन कहते हैं। वेद कहता है-तुम्हारे अनन्त नाम,

29रूप हैं। ज्ञानी जन तुम्हारे ब्रह्म स्वरूप की उपासना करते हैं। योगी

30जन तुम्हारे परमात्मा स्वरूप में अपने मन को एकाग्र करते हैं।

31सगुण साकार रूप के उपासक श्यामा-श्याम रूप से तुम्हारी ही

32अर्चना वन्दना करते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारा जो ब्रह्म-स्वरूप है

33उसमें शक्तियों का विकास अल्प मात्रा में ही होता है, इस कारण

34प्रेमी-जनों को ब्रह्म का रूप प्रिय नहीं प्रतीत होता। ब्रह्म स्वरूप

35की उपासना करने वाले ज्ञानी मुक्त होकर ब्रह्म में ऐक्य को प्राप्त

36कर लेते हैं (सायुज्य मुक्ति)। ज्ञानी जन साकार के रूप, लीला,

37गुणों आदि का आस्वादन नहीं कर पाते। ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण

38निराकार है; अतः भक्तों को यह स्वरूप आनन्द प्रदान नहीं कर

39पाता। परमात्मा (महाविष्णु) के उपासक योगी वैकुण्ठ को प्राप्त

40हो जाते हैं किन्तु वहाँ भी लीला का रसास्वादन नहीं होता। यद्यपि

41महाविष्णु नाम, रूप, गुण से युक्त हैं परन्तु लीला एवं परिकर से

42रहित होने के कारण भक्तों को विशेषतः आकर्षित नहीं कर पाते।

43ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् सभी ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान एवं

44वैराग्य से युक्त हैं, सभी सत्, चित् आनन्दमय हैं। ये सभी सम्पूर्ण

45शक्तियों से परिपूर्ण हैं। इन समस्त स्वरूपों में श्रीकृष्ण का स्वरूप

46अत्यधिक आकर्षक है। श्रीकृष्ण अपने प्रियजनों के प्रति अत्यन्त

47ही कृपालु हैं अतः रसिकों को उनका यह स्वरूप ही आनन्द प्रदान

48करता है। कृपा आदि गुणों में ही पर्याप्त अन्तर होता है अतः श्री

49कृपालुजी कहते हैं हे मन! तू भ्रमित न हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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