# तू ही बस इक अवतारी बलभाय,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-011
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 36–38



<a id="line-1"></a>तू ही बस इक अवतारी बलभाय,  
<a id="line-2"></a>और भगवान अवतार कहाय।  
<a id="line-3"></a>तु ही स्वयं भगवान रसिक बताय,  
<a id="line-4"></a>और सब अवतार स्वांश कहाय।  
<a id="line-5"></a>तेरे हैं अनन्त रूप अस श्रुति गाय,  
<a id="line-6"></a>वैसे ही अनन्त नाम श्रुति बतलाय।  
<a id="line-7"></a>ज्ञानिन को तेरा रूप ब्रह्म मन भाय,  
<a id="line-8"></a>योगिन को तू ही परमात्मा लखाय।  
<a id="line-9"></a>भक्तन प्रिय छवि श्यामा श्याम आय,  
<a id="line-10"></a>जाको मन भाय यामें वामें मन लाय।  
<a id="line-11"></a>ब्रह्म में तो शक्ति न्यूनतम प्रकटाय,  
<a id="line-12"></a>याते वाय रसिकन नहिं अपनाय।  
<a id="line-13"></a>ब्रह्म रूप पाके ज्ञानी मुक्त ह्वै जाय,  
<a id="line-14"></a>किन्तु नहिं नाम रूप लीला गुण वाय।  
<a id="line-15"></a>ब्रह्म रूप अगुण अरूप कहाय,  
<a id="line-16"></a>याते यह रसिकन नाहिं सुहाय।  
<a id="line-17"></a>परमात्मा में नाम रूप गुण भाय,  
<a id="line-18"></a>सोउ लीला परिकर रहित बताय।  
<a id="line-19"></a>सब रूप षट ऐश्वर्ययुत आय,  
<a id="line-20"></a>सब सत चित आनँद कहलाय।  
<a id="line-21"></a>सब में ही सब शक्ति वेद बताय,  
<a id="line-22"></a>सबते सरस रसयुत बलभाय।

<a id="line-23"></a>कृपा आदि गुण में ही अन्तर आय,  
<a id="line-24"></a>याते तू “कृपालु” जनि मन भरमाय।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-25"></a>भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे अन्य अवतार तो अवतार हैं  
<a id="line-26"></a>किन्तु तुम उन अवतारों के अवतारी हो अर्थात् तुम्हारे अतिरिक्त जो  
<a id="line-27"></a>अवतार हैं वे तुम्हारे स्वांश हैं।  
<a id="line-28"></a>ऐसा रसिक जन कहते हैं। वेद कहता है-तुम्हारे अनन्त नाम,  
<a id="line-29"></a>रूप हैं। ज्ञानी जन तुम्हारे ब्रह्म स्वरूप की उपासना करते हैं। योगी  
<a id="line-30"></a>जन तुम्हारे परमात्मा स्वरूप में अपने मन को एकाग्र करते हैं।  
<a id="line-31"></a>सगुण साकार रूप के उपासक श्यामा-श्याम रूप से तुम्हारी ही  
<a id="line-32"></a>अर्चना वन्दना करते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम्हारा जो ब्रह्म-स्वरूप है  
<a id="line-33"></a>उसमें शक्तियों का विकास अल्प मात्रा में ही होता है, इस कारण  
<a id="line-34"></a>प्रेमी-जनों को ब्रह्म का रूप प्रिय नहीं प्रतीत होता। ब्रह्म स्वरूप  
<a id="line-35"></a>की उपासना करने वाले ज्ञानी मुक्त होकर ब्रह्म में ऐक्य को प्राप्त  
<a id="line-36"></a>कर लेते हैं (सायुज्य मुक्ति)। ज्ञानी जन साकार के रूप, लीला,  
<a id="line-37"></a>गुणों आदि का आस्वादन नहीं कर पाते। ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण  
<a id="line-38"></a>निराकार है; अतः भक्तों को यह स्वरूप आनन्द प्रदान नहीं कर  
<a id="line-39"></a>पाता। परमात्मा (महाविष्णु) के उपासक योगी वैकुण्ठ को प्राप्त  
<a id="line-40"></a>हो जाते हैं किन्तु वहाँ भी लीला का रसास्वादन नहीं होता। यद्यपि  
<a id="line-41"></a>महाविष्णु नाम, रूप, गुण से युक्त हैं परन्तु लीला एवं परिकर से  
<a id="line-42"></a>रहित होने के कारण भक्तों को विशेषतः आकर्षित नहीं कर पाते।  
<a id="line-43"></a>ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् सभी ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान एवं  
<a id="line-44"></a>वैराग्य से युक्त हैं, सभी सत्, चित् आनन्दमय हैं। ये सभी सम्पूर्ण  
<a id="line-45"></a>शक्तियों से परिपूर्ण हैं। इन समस्त स्वरूपों में श्रीकृष्ण का स्वरूप

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-46"></a>अत्यधिक आकर्षक है। श्रीकृष्ण अपने प्रियजनों के प्रति अत्यन्त  
<a id="line-47"></a>ही कृपालु हैं अतः रसिकों को उनका यह स्वरूप ही आनन्द प्रदान  
<a id="line-48"></a>करता है। कृपा आदि गुणों में ही पर्याप्त अन्तर होता है अतः श्री  
<a id="line-49"></a>कृपालुजी कहते हैं हे मन! तू भ्रमित न हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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