# प्रान प्रान मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-012
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 38–40



<a id="line-1"></a>प्रान प्रान मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-2"></a>सब देहन देही करि माना,  
<a id="line-3"></a>प्रान श्रुतिन तव कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-4"></a>प्रानन प्रान श्रुतिन पुनि माना,  
<a id="line-5"></a>वेद वेद्य तोहिं कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-6"></a>तनु जिमि प्रान दास जग जाना,  
<a id="line-7"></a>प्रान दास तिमि कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-8"></a>निज दासत्व भुलायेहु प्राना,  
<a id="line-9"></a>पायेहु दुख जग कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-10"></a>गुरु ने ज्ञान दिया तब जाना,  
<a id="line-11"></a>मेरो स्वामी कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-12"></a>जग सुख विष्ठा सम अब माना,  
<a id="line-13"></a>शरण गही तव कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-14"></a>हौं अस पतित पतित नहिं माना,  
<a id="line-15"></a>आपुन कहँ हौं कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-16"></a>जग सुख सब मिथ्या बुधि जाना,

<a id="line-17"></a>तदपि न माना कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-18"></a>तत्वसार अब हौं यह जाना,  
<a id="line-19"></a>कृपा याचना कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।  
<a id="line-20"></a>अब तो है “कृपालु” तोहिं पाना,  
<a id="line-21"></a>जैसे भी हो कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-22"></a>भावार्थ—हे मेरे प्राणों के प्राण कृष्ण! वेद ऐसा कहता है कि  
<a id="line-23"></a>सब शरीरों में प्राण ही प्रमुख है। वेदों द्वारा जानने योग्य तुम उन  
<a id="line-24"></a>प्राणों के भी प्राण हो। संसार में ऐसा देखा जाता है कि शरीर का  
<a id="line-25"></a>स्वामी प्राण है शरीर प्राणों का दास है, उसी प्रकार प्राण भी तुम्हारा  
<a id="line-26"></a>दासत्व करता है। तुम्हारी शक्ति के बिना प्राण भी स्वतन्त्र रूप से  
<a id="line-27"></a>कोई चेष्टा करने में असमर्थ है। प्राणों ने जब से अपने धर्म (तुम्हारी  
<a id="line-28"></a>सेवा) को भुलाया, तभी से प्राणी संसार में नाना प्रकार के कष्ट पा  
<a id="line-29"></a>रहे हैं। गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान से जब जीव यह जान लेता है कि  
<a id="line-30"></a>उसके स्वामी एकमात्र तुम ही हो तब उसे सांसारिक सुख (धन,  
<a id="line-31"></a>मान आदि) विष्ठा के समान ही प्रतीत होने लगते हैं। संसार से  
<a id="line-32"></a>वैराग्य होने पर ही तुम्हारी शरण में जीव आता है। हे मेरे परम  
<a id="line-33"></a>पावन प्रभु! मैं तो स्वयं को पतित भी स्वीकार नहीं करता ऐसा  
<a id="line-34"></a>विचित्र पतित हूँ। हे श्यामसुन्दर! मेरी बुद्धि संसार के सुखों को  
<a id="line-35"></a>असत्य समझती है किन्तु मेरी विवशता तो यही है कि मैं अपने मन  
<a id="line-36"></a>के वशीभूत होकर संसार में पुनः आसक्त हो जाता हूँ। मेरा वैराग्य  
<a id="line-37"></a>श्मशान वैराग्य है। सत्संग द्वारा मैंने यही सार निकाला कि तुम्हारे  
<a id="line-38"></a>समक्ष दीन बनकर मैं तुमसे तुम्हारी कृपा की याचना करूँ। कभी  
<a id="line-39"></a>तो तुम अपनी कृपा दृष्टि का अधिकारी मुझे बना ही लोगे। कृपालुजी

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-40"></a>कहते हैं- हे मेरे जीवन! मेरे सर्वस्व! जिस किसी भी प्रकार से  
<a id="line-41"></a>प्राणों की बाजी लगाकर भी अब तो तुम्हें प्राप्त करने का दृढ़  
<a id="line-42"></a>संकल्प कर लिया है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
