Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जाना तू ही मम कान्हा जाना, जाना जाना जाना।
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1जाना तू ही मम कान्हा जाना, जाना जाना जाना।
2तनु के जनकहिं जनकहिं माना,
3जीव जनक नहिं जाना, जाना जाना जाना।
4तनु की जननि जननि निज माना,
5जीव जननि नहिं जाना, जाना जाना जाना।
6तनु के भ्रात भ्रात निज माना,
7जीव भ्रात नहिं जाना, जाना जाना जाना।
8तनु के स्वामिन स्वामिन माना,
9जीव स्वामि नहिं जाना, जाना जाना जाना।
10तनु के सखन सखन निज माना,
11जीव सखहिं नहिं जाना, जाना जाना जाना।
12तनु के सुतन सुतन निज माना,
13जीव सुतहिं नहिं जाना, जाना जाना जाना।
14तनु के पतिन पतिन निज माना,
15जीव पतिहिं नहिं जाना, जाना जाना जाना।
16तनु को ही निज जीवहिं माना,
17निज जीवहिं नहिं जाना, जाना जाना जाना।
18तब “कृपालु” तू ही मम माना,
19रसिक कृपा जब जाना, जाना जाना जाना।
20भावार्थ—हे श्यामसुन्दर! मैं तुम्हारी कृपा द्वारा इस रहस्य को
21जान गया कि एकमात्र तुम ही मेरे हो। अभी तक मैंने शरीर के
22पिता को पिता माना, आत्मा के पिता को नहीं जान सका। शरीर
23की माँ को ही मैं अपनी माता समझता रहा, आत्मा की माँ तुम ही
24हो, इस सत्य से तो मैं अपरिचित ही रहा। मैंने शरीर के भाई
25बन्धुओं को ही अपना माना आत्मा के बंधु तो एकमात्र तुम हो,
26इसे मैं नहीं समझ सका। शरीर के स्वामी को ही अज्ञानवश मैं
27अपनी आत्मा का स्वामी मानता रहा परन्तु जीव के तो सच्चे स्वामी
28तुम ही हो इसे मैं नहीं जान पाया। शरीर के मित्रों को ही मैं अपना
29समझता रहा, आत्मा के सच्चे सखा तुम हो, इसे मैं मायावश भूला
30रहा। शरीर के पुत्र-पुत्री आदि को ही मैं अपना मानता रहा जीव
31के वास्तविक पुत्र तुम हो, यह तो मैंने जाना ही नहीं। मैं शरीर के
32पति को ही अपना पति मानता रहा। आत्मा के सच्चे पति तो तुम
33हो यह तो मैंने जाना ही नहीं। मैं शरीर को ही आत्मा समझता
34रहा, अतः आत्मा के स्वरूप से अनभिज्ञ रहा। हे श्रीकृष्ण! जब
35तुम्हारे प्रेमी जनों की कृपा मुझे प्राप्त हुई तब मैंने समझा कि मेरी
36आत्मा के सच्चे पिता, माता, भाई, स्वामी, मित्र, पुत्र, पति आदि
37एकमात्र तुम ही हो।