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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

जीवनधन नंदकुमार, तन मन धन प्रानन वार।

Reading 20 of 112 · Source no. 8 · Source PDF 31–32

1जीवनधन नंदकुमार, तन मन धन प्रानन वार।

2कह वेदहु नेति पुकार, सोई है मम भरतार॥

3आनँद घन तन सरकार, बह रोम रोम रस धार।

4लखि कोटि काम दउँ वार, सोई है मम भरतार॥

5जो मोर मुकुट सिर धार, जेहि कारी लट घुँघरार।

6जेहि केशर तिलक लिलार, सोई है मम भरतार॥

7जो कानन कुंडल धार, दृग कजरारे रतनार।

8नासा बेसर छविदार, सोई है मम भरतार॥

9जो उर कौस्तुभ मणि धार, पीतांबर छवि छविदार।

10जो नटवर भेष सँवार, सोई है मम भरतार॥

11जो कनकन कंकन धार, कटि काछनि छवि रिझवार।

12जेहि पग नूपुर झनकार,सोई है मम भरतार॥

13जो रूप सुधा रस सार,जो निराधार आधार।

14ब्रजनार प्राण साकार,सोइ मम “कृपालु” भरतार॥

15भावार्थ—भक्त अपने इष्ट को सम्बोधन करता है-हे मेरे

16जीवन-सर्वस्व रूप नंदनंदन! मैं तुम पर अपने तन, मन, धन एवं

17प्राणों को न्यौछावर करता हूँ। जिस तत्व को वेद ने नेति नेति-न

18इति, न इति कहकर पुकारा वही श्रीकृष्ण मेरे प्राणपति हैं। श्याम

19सरकार का दिव्य शरीर आनन्दघन स्वरूप है। उस दिव्य तनु के

20रोम-रोम से आनन्द-रस की धारा प्रवाहित होती रहती है। जिसके

21रूप पर करोड़ों कामदेव का सौन्दर्य फीका पड़ जाता है, वही मेरे

22प्रियतम हैं। जिनके सिर पर मोर-मुकुट शोभायमान है, जिनके

23मस्तक पर काली घुँघराली केशराशि क्रीड़ा कर रही है, जिनके

24ललाट पर केसर का तिलक चमक रहा है, मेरे प्राणप्रिय वही हैं।

25जिनके कर्ण-कुण्डलों से विभूषित हैं, अरुणिमा युक्त नेत्रों में काजल

26सँवारा गया है, जिनकी नासिका में बेसर छवि पा रही है, वही

27श्यामसुन्दर मेरे प्राणबल्लभ हैं। जिनका विशाल वक्षःस्थल कौस्तुभ

28मणि से दैदीप्यमान है, अंग दिव्य छवि से युक्त पीताम्बर से

29आच्छादित है, श्रेष्ठ नट के समान जिन्होंने वेशभूषा धारण की है,

30वही मेरे प्राणधन हैं। जिनके कोमल करों में स्वर्ण कंकण धारण

31कराये गये हैं, सूक्ष्म कटि प्रदेश पर काछनी कसी है जिनके चरण

32प्रान्त नूपुरों की मधुर झनकार से युक्त हैं, वे ही मेरे प्राणपति हैं।

33जिनका अलौकिक रूप मानो अमृत के भी सार तत्व से निर्मित है।

34दिव्य रूप सुधा से युक्त होकर भी जो अपनी करुणा से निराधारों

35के आधार स्वरूप हैं, जो ब्रजगोपियों के साकार प्राण स्वरूप ही हैं

36वे ही कृपालु कृष्ण मुझ अकिंचन के भी प्राण स्वरूप हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version