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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तुम मम प्रियतम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 21 of 112 · Source no. 9 · Source PDF 32–34

1तुम मम प्रियतम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2हौँ कान्हा अब लौँ नहिँ जाना,

3रहेउ विमुख तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4तप्यो त्रितापन पापन कान्हा,

5पायो जग दुख नाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

6बाँध्यो आपु आपु कहँ कान्हा,

7मकड़ी जाल समाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

8भोग्यो लख चौरासी कान्हा,

9योनि जनमि दुख नाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

10रसिक जनायेहु तब मैं जाना,

11मैं हूँ आत्मा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12आत्मा की आत्मा तू कान्हा

13यह भी अब मैं जाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

14अब तो गह्यो शरण तव कान्हा,

15जग मृग जल ज्यों जाना, कान्हा कान्हा कान्हा।

16अब लौं किय मनमाना कान्हा,

17अब माना मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18तत्व “कृपालु” सार यह जाना,

19छिन छिन भजु मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20भावार्थ—भक्त अपने इष्ट श्रीकृष्ण से कहता है-हे मेरे प्राण

21स्वरूप कृष्ण! अब मैं जान गया कि तुम ही मेरे वास्तविक प्रियतम

22हो। अभी तक तुमसे विमुख रहने के कारण माया से मैं स्वयं को

23शरीर समझता रहा, अतः तुम्हारा मुझसे क्या सम्बन्ध है, यह मैं

24नहीं जान सका। तुम्हारी सन्मुखता न रहने से मैं पाप करता रहा,

25परिणामस्वरूप दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से तपते हुए संसार

26में मैंने भाँति-भाँति के दुःख भोगे। अपने कर्म जाल में मैंने स्वयं ही

27स्वयं को फँसा लिया, जिस प्रकार मकड़ी अपने मुख से ही जाला

28बनाकर इसी में स्वयं फँस जाती है। माया से भ्रमित हुआ मैं चौरासी

29लाख योनियों में भटकता रहा। जब मुझे तुम्हारे प्रेमी भक्तों का संग

30प्राप्त हुआ तब यह रहस्य मेरी समझ में आया कि मैं शरीर नहीं हूँ,

31तुम्हारा अंश, आत्मा हूँ। मुझ आत्मा की भी आत्मा एकमात्र तुम्हीं

32हो यह अब मेरी समझ में आया है। जब मैंने स्वयं को आत्मा

33स्वीकार किया तब तुम्हारी शरण में आया हूँ। अब स्पष्ट प्रतीत

34होता है कि जगत् के सुख मृग-जल के समान ही मिथ्या है।

35अज्ञानवश अभी तक तुम्हारे सन्मुख न होने के कारण मैं मनमानी

36करता रहा परन्तु अब तो मेरा मन तुम्हारे चरणों में आ गया, अतः

37कृपालुजी कहते हैं- जीवन का सार मेरी समझ में आ गया, वह

38यह कि मन से प्रतिक्षण तुम्हारा स्मरण, भजन ही करना है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version