Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जाना छलबल तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1जाना छलबल तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2दुर्वासा तेरे गुरु कान्हा,
3मरम बतायो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4वाने कही ब्रह्म तू कान्हा,
5मायापति है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6शक्ति योगमाया इक कान्हा,
7तव छलबल सोइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8वाते जो चह सो कर कान्हा,
9अति स्वतन्त्र बनि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10जो चाहे नहिं करनो कान्हा,
11वाते नहिं कर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12जो उलटो करनो चह कान्हा,
13वाही ते कर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14वाते बिनु दृग देखे कान्हा,
15सुनै कान बिनु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16गंध ग्रहइ बिनु नासा कान्हा,
17परस त्वचा बिनु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18रसना बिनु सब रस ले कान्हा,
19मन बिनु सोचै कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20सब इंद्रिन विषयन ले कान्हा,
21एकहिं इंद्रिन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22इंद्रिन कर्म करे नहिं कान्हा,
23सोचि रचै जग कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
24सोचि “कृपालु” पाल जग कान्हा,
25सोचि प्रलय कर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥
26भावार्थ—भक्त रसिकता की शैली में श्यामसुन्दर से कहता
27है-हे कृष्ण! मैं तुम्हारे छल को समझ गया। तुम्हारे गुरु दुर्वासा ने
28मुझे तुम्हारा रहस्य-तुम ब्रह्म हो, समझा दिया है। ब्रह्म होने के
29कारण तुम माया के स्वामी हो। तुम्हारी एक योगमाया शक्ति है
30उसी के द्वारा अनेक छलयुक्त कार्य तुम करते रहते हो। योगमायाधीश
31होने के कारण तुम स्वतन्त्रता पूर्वक जो चाहते हो करते हो, जो
32नहीं करना चाहते हो, नहीं करते। यदि विपरीत कार्य करना चाहते
33हो तो वह भी योगमाया द्वारा कर लेते हो। इस योगमाया शक्ति
34द्वारा ही तुम बिना नेत्रों के भी देख लेते हो, बिना कानों के सुनते
35हो। तुम बिना नासिका ही सूँघने की सामर्थ्य रखते हो। त्वचा के
36बिना ही स्पर्श कर लेते हो। रसनेन्द्रिय के अभाव में तुम रसास्वादन
37कर सकते हो। इस योगमाया की शक्ति से, बिना मन के ही तुम
38सोचने का कार्य कर सकते हो। योगमाया शक्ति इतनी विलक्षण है
39कि इसके द्वारा तुम एक इन्द्रिय से समस्त इन्द्रियों के विषयों को
40ग्रहण कर सकते हो। योगमाया द्वारा तुम इन्द्रियों की सहायता के
41बिना केवल संकल्प मात्र से सृष्टि प्रकट करते हो श्री कृपालुजी
42कहते हैं कि संकल्प मात्र से ही विश्व का पालन करते हो। संकल्प
43से ही सृष्टि का प्रलय कर देते हो।