Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
काहे चोरा चित मोरा भोरा भारा छलिया,
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1काहे चोरा चित मोरा भोरा भारा छलिया,
2तोरा मैंने क्या किया बुरा बता दे छलिया।
3चित तो था सदा का ही साथी मोरा छलिया,
4रही मेरी जमा पूँजी चित में ही छलिया।
5जो जो किये मैंने सुकृत सदा ते छलिया,
6चित में ही वह सबरो धरा था छलिया।
7किये जो जो पाप मैंने सदा ही ते छलिया,
8चित के ही साथ छिना सोउ सब छलिया।
9चित में ही रहे मेरे तीनों गुण छलिया,
10सोउ लिया किया मोहिं निर्गुण छलिया।
11रहे चित में ही माता, पिता, सुत छलिया,
12सोउ गये चित सँग क्या किया रे छलिया।
13चित बिनु यह तनु तो है माटी छलिया,
14चित सँग गइँ सब इंद्रिहुँ छलिया।
15चित तो था एक ही न था अनेक छलिया,
16दे दे चित या “कृपालु” ले ले प्राण छलिया।
17भावार्थ—कोई गोपी श्रीकृष्ण को लक्ष्य कर कह रही है-अरे
18भोले भाले प्रतीत होने वाले नटखट! भला मैंने, तुम्हारा क्या बिगाड़ा
19था? जब से जीवात्मा है तब से चित्त भी उसके साथ जुड़ा हुआ
20है। कर्म संस्कार चित्त में ही एकत्रित रहते हैं। मैंने जो शुभ कर्म
21किये थे वे चित्त के द्वारा ही किये गये थे। अशुभ कर्म भी चित्त
22द्वारा ही किये जाते हैं। हे चित्तचोर! तुमने मेरा चित्त क्या चुराया,
23मेरे शुभ-अशुभ कर्मों की पूंजी ही चुरा ली-बिना चित्त के कर्म
24भी नहीं बन सकता। वस्तुतः श्रीकृष्ण अत्यन्त ही दयामय हैं, जिस
25पर कृपा करके उसका चित्त चुराते हैं उसे सदा के लिये कर्म बंधन
26से मुक्त कर देते हैं। माया के तीनों गुण भी चित्त में ही रहते हैं,
27जब चित्त चुराया गया तो चित्त के साथ ही चित्त में रहने वाले
28सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण भी चले गये। जीव निर्गुण अर्थात् माया
29के गुणों से रहित हो गया। संसारी माता, पिता, पुत्र आदि भी चित्त
30में ही रहते हैं। चित्त के लुटने पर वे भी जीवात्मा का साथ छोड़
31गये। चित्त के बिना शरीर जड़ सा ही है। इन्द्रियाँ मन के अधीन
32होकर ही कार्य करती हैं। चित्त के चले जाने पर उन्होंने भी शरीर
33का साथ छोड़ दिया। अब मन इन्द्रियों से रहित शरीर केवल मृत्तिका
34मात्र ही रह गया। हे छलिया कृष्ण! मन तो एक ही होता है; वह
35भी तुमने ले लिया अब शरीर की चेष्टाएँ भी किस प्रकार हों,
36कृपालुजी कहते हैं अब तुम मेरे प्राणों को भी ले लो अन्यथा मेरे
37चित्त को लौटा दो।