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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कान्हा मैंने यह जाना, जाना जाना जाना।

Reading 16 of 112 · Source no. 4 · Source PDF 23–25

1कान्हा मैंने यह जाना, जाना जाना जाना।

2तू ही मम प्रियतम है कान्हा,

3वेद पुरान प्रमाना, जाना जाना जाना।

4सबै जीव तव प्रेयसि कान्हा,

5सब का पिय तू जाना, जाना जाना जाना।

6तव उपकार अमित हैं जाना,

7उऋण न होइ सक कान्हा, जाना जाना जाना।

8सुर दुर्लभ नर तनु श्रुति माना,

9तुम दीने मोहिं कान्हा, जाना जाना जाना।

10मोहिं मिलायो गुरु ते कान्हा,

11गुरु ने दिय मोहिं ज्ञाना, जाना जाना जाना।

12गुरु ने कही शरण गहु कान्हा,

13तजु बल साधन नाना, जाना जाना जाना।

14दिये और गुरु ने मोहिं ज्ञाना,

15चाहहु नित सुख कान्हा, जाना जाना जाना।

16यद्यपि कर्म, योग अरु ज्ञाना,

17तीनिहुँ पथ बुध माना, जाना जाना जाना।

18कछु बुध जन औरहु पथ माना,

19सबै व्यर्थ बिनु कान्हा, जाना जाना जाना।

20जाय “कृपालु” न माया कान्हा,

21कान्ह कृपा बिनु जाना, जाना जाना जाना।

22भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! मैं यह भली प्रकार से समझ गया कि

23एकमात्र तुम ही मेरे प्रियतम हो। इस सत्य को वेदों ने प्रकाशित

24किया। विश्व के समस्त जीव तुम्हारी प्रेयसी हैं एवं तुम ही उनके

25प्रियतम हो। मुझे यह ज्ञात है कि तुमने मेरे साथ असंख्य उपकार

26किये हैं। मैं तुम्हारे किये हुए उपकारों से कभी उऋण नहीं हो

27सकता। शास्त्र कहते हैं-

28बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सद् ग्रंथनि गावा।

29[राम चरित मानस]

30मानव देह देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। तुमने अपनी कृपा

31से सहज में ही वह मानव देह प्रदान की। मानव शरीर पाकर भी

32गुरु की प्राप्ति नहीं हो पाती किंतु तुमने अपनी कृपा से ही मुझे गुरु

33प्रदान किया। तब मुझे गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त हुआ। गुरु ने मुझे तुम्हारी

34शरणागति का मार्ग दिखाया। गुरु द्वारा ही मुझे यह रहस्य ज्ञात हुआ

35कि अपने साधन बल से तुम्हें कोई प्राप्त नहीं कर सकता। गुरु ने

36ही यह ज्ञान दिया-कि प्रेमी को प्रेमास्पद के सुख की ही कामना

37करनी है-विद्वानों ने तुम्हारी प्राप्ति-हेतु कर्म, योग एवं ज्ञान मार्ग

38बताये हैं। अन्य शास्त्रावलम्बियों ने और भी मार्ग तुम्हारी प्राप्ति-

39हेतु बताये किन्तु तुम्हें छोड़कर कोई भी मार्ग तुम्हारी प्राप्ति नहीं

40करा सकता। तुम्हारी प्राप्ति में तो तुम्हारी कृपा ही प्रमुख कारण है।

41श्री कृपालुजी कहते हैं कि यह दुष्कर माया तो मायापति कृष्ण की

42कृपा से ही जायगी।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version