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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कान्हा मैंने अब तोहिं जाना, जाना जाना जाना।

Reading 15 of 112 · Source no. 3 · Source PDF 21–23

1कान्हा मैंने अब तोहिं जाना, जाना जाना जाना।

2जानि न सक कोउ बुधि बल कान्हा,

3रसिक कृपा यह जाना, जाना जाना जाना।

4हारि गये विधि हरि हर कान्हा,

5तबहुँ न महिमा जाना, जाना जाना जाना।

6शक्ति योगमाया है कान्हा,

7कारण मैंने जाना, जाना जाना जाना।

8करे असंभव संभव कान्हा,

9इहै शक्ति तव जाना, जाना जाना जाना।

10हो विरुद्ध कर्मी तुम कान्हा,

11याते नहिं कोउ जाना, जाना जाना जाना।

12आत्माराम कहत तोहिं कान्हा,

13परदारा रत जाना, जाना जाना जाना।

14श्रुति कह पूर्णकाम हैं कान्हा,

15रास किये जग जाना, जाना जाना जाना।

16सोलह सहस्र एक सौ कान्हा,

17आठ ब्याह किये जाना, जाना जाना जाना।

18प्रति नारिन दस दस सुत कान्हा,

19तदपि काम नहिं जाना, जाना जाना जाना।

20शत शत असुरन मारेहु कान्हा,

21तदपि क्रोध नहिं जाना, जाना जाना जाना।

22कार्य करे माया का कान्हा,

23रहे अकर्ता जाना, जाना जाना जाना।

24मन बुधि पर “कृपालु” कह कान्हा,

25याही हौं बुधि जाना, जाना जाना जाना।

26भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! रसिकों की कृपा से मैंने इस रहस्य

27को समझ लिया कि तुम्हें अपनी बुद्धि के बल से कोई नहीं जान

28सकता-

29राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहु सयानी।

30भागवत कहती है—

31नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदुर्न, वामदेवः किमुतापरे सुराः।

32तन्मायया मोहित बुद्धयस्त्विदं, विनिर्मितं चात्म समं प्रचक्ष्महे।

33ब्रह्मा अपनी बुद्धि का बल लगाकर थक गये परन्तु तुम्हारी

34महिमा का पार नहीं पा सके। शिव एवं महाविष्णु तुम्हारे स्वांश होते

35हुए भी तुम्हें पूर्ण रूप से जानने में असमर्थ हैं, तुम्हें न जान सकने

36में तुम्हारी योगमाया ही कारण है। तुम्हारी यह पराशक्ति असम्भव को

37भी सम्भव कर देती है। तुम कर्तुम्, (करने योग्य) अकर्तुम् (न करने

38योग्य) एवं अन्यथा कर्तुम् समर्थ (उल्टा करने में समर्थ) हो। हे

39प्रभु! तुममें नित्य ही विरोधी धर्मों का वास है। इस विरोधाभास के

40कारण ही कोई तुम्हें पहचान नहीं पाता। भागवत तुम्हें आत्माराम

41कहती है किन्तु ब्रज में रहते हुए तुमने पर स्त्रियों के साथ रास-विलास

42किया। वेद तुम्हें पूर्णकाम कहता है परन्तु तुमने सोलह हजार एक सौ

43आठ राजकुमारियों के साथ विवाह किया। तुम्हारी प्रत्येक रानी के दस

44दस पुत्र उत्पन्न हुए परन्तु तुम काम वासना से अछूते रहे। हे केशव!

45तुमने सैंकड़ों राक्षसों का वध किया किन्तु क्रोध तुम्हारा स्पर्श नहीं कर

46सका। तुम अपनी योगमाया शक्ति के द्वारा यद्यपि माया के कार्य करते

47हुए से प्रतीत होते हो परन्तु वस्तुतः तो सदैव अकर्ता ही रहते हो।

48श्री कृपालुजी कहते हैं-मैंने तो अपनी बुद्धि से यही निर्णय

49किया कि श्रीकृष्ण मन एवं बुद्धि द्वारा नहीं जाने जा सकते।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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