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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कान्हा तू ही मेरा अब जाना, जाना जाना जाना।

Reading 14 of 112 · Source no. 2 · Source PDF 18–21

1कान्हा तू ही मेरा अब जाना, जाना जाना जाना।

2रसिकन कह तु ही स्वामी मम कान्हा,

3मैं हुँ दास यह जाना, जाना जाना जाना।

4रसिकन कह तु ही सखा मम कान्हा,

5मैं भी सखा यह जाना, जाना जाना जाना।

6रसिकन कह तु ही मम सुत कान्हा,

7मैं हुँ माता पिता तव जाना, जाना जाना जाना।

8रसिकन कह तु ही मेरो पिय कान्हा,

9मैं हुँ तेरी प्रेयसि जाना, जाना जाना जाना।

10श्रुति कह तु ही तो है अंशी मेरा कान्हा,

11मैं हुँ अंश तेरा यह जाना, जाना जाना जाना।

12श्रुति कह तु ही माता, पिता, भ्राता कान्हा,

13सब नाता तोसों यह जाना, जाना जाना जाना।

14श्रुति कह जीवन जीवन कान्हा,

15तव तनु जीवन जाना, जाना जाना जाना।

16श्रुति कह सब रह तुझमें ही कान्हा,

17रह सब में ही तू जाना, जाना जाना जाना।

18श्रुति कह जीवन कर्मन कान्हा,

19तु ही लिखे फल भी दे जाना, जाना जाना जाना।

20श्रुति कह जग में तू रह नित कान्हा,

21जग नहिं तोमें रह जाना, जाना जाना जाना।

22श्रुति कह जिसको जना दे तु ही कान्हा,

23सोइ “कृपालु” तोहिं जाना, जाना जाना जाना।

24भावार्थ—भक्त श्रीकृष्ण के प्रति कहता है-हे श्रीकृष्ण! मैं

25अब समझ गया कि एकमात्र तुमसे ही मेरा सम्बन्ध है। हे गोविंद!

26तुम्हारे प्रिय भक्त-जन बताते हैं कि जीवों के एकमात्र स्वामी तुम्हीं

27हो, जीव तुम्हारा नित्य दास है। तुम्हारे प्रेमी जनों ने ही जगत् को

28इस सत्य से अवगत कराया कि जीव के नित्य सखा एकमात्र तुम्हीं

29हो। वेद कहता है-

30द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया

31हे प्रभु! तुम्हारे रसिक सन्त ही कहते हैं- तुम जगत् पिता

32होकर भी जीव के भावानुसार उसके पुत्र भी बन जाते हो, क्षुद्र

33जीव को अपने माता-पिता बनने का गौरव प्रदान करते हो।

34हे नाथ! मैंने तुम्हारे प्रेमी-जनों से ही यह सुना है कि तुम मेरे

35प्रियतम हो और मैं तुम्हारी प्रेयसी। श्यामसुन्दर! वेद कहता है-

36तुम मेरे अंशी हो, मैं तुम्हारा अंश।

37चिन्मात्रं श्री हरेरंशम्।

38वेद में तुम्हीं ने तो बताया है-तुम्हीं जीव के माता-पिता, भ्राता

39आदि हो। मैं अब भली प्रकार से समझ गया कि मेरे समस्त

40सम्बन्ध एकमात्र तुमसे ही हैं। वेद यह भी कहता है- जीवों को

41जीवन प्रदान करने वाले एकमात्र तुम ही हो। जीव तो तुम्हारा

42शरीर ही है।

43य आत्मनि तिष्ठति

44के अनुसार तुम सबमें रहते हो एवं सब तुममें रहते हैं। हे मेरे

45कृष्ण! तुमने वेद में यह भी बताया है कि समस्त जीवों के कर्मों

46का लेखा जोखा भी तुम्हीं रखते हो एवं कर्मानुसार जीवों को

47समय पर उनके कर्मों का फल भी तुम्हीं प्रदान करते हो। वेद यह

48भी कहता है कि जगत् में तुम्हारा नित्य निवास है-

49ईशावास्यमिद ्ँ सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।

50आश्चर्य तो यह है कि तुम जगत् में व्याप्त हो परन्तु जगत्

51तुम्हारा स्पर्श नहीं कर पाता। माया में रहकर भी तुम मायातीत हो।

52वेद कहता है कि हे कृपालु! तुम अपनी कृपा द्वारा जिसे अपने को

53जना दो वही तुम्हें जान सकता है।

54यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू ्ँ स्वाम्।

55रामायण कहती है-

56सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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