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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

Reading 13 of 112 · Source no. 1 · Source PDF 16–18

1अपना बनाया तोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

2तू अपनी माने या कान्हा,

3नहिं माने मोहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

4तू ही मेरा यह रह कान्हा,

5भाव नित्य मम कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

6मैं तेरी यह भाव न कान्हा,

7चह हौं सपनेहुँ कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

8ब्रह्मलोक तक के सुख कान्हा,

9हौँ न चहौँ टुक कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

10भूलेहुँ मुक्तिहुँ चह नहिं कान्हा,

11तुम न मिलहु तहँ कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

12बैकुंठहुँ सुख नहिं चह कान्हा,

13तहँ ब्रज रस नहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

14मथुरा द्वारवतिहुँ रस कान्हा,

15ब्रज रस सम नहिं कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

16जब भी दो “कृपालु” मोहिं कान्हा,

17ब्रज रस ही दो कान्हा, कान्हा मेरे कान्हा।

18भावार्थ—भक्त अपनी आत्मा की आत्मा श्रीकृष्ण के प्रति

19अपने हृदय के उद्गार प्रकट करते हुए कहता है- हे कन्हैया! मैं

20तो सदा-सदा के लिये तुम्हें अपना बना चुका हूँ। मैं तुमसे यह

21आशा नहीं रखता कि तुम भी मुझे अपना बनाओ। “तुम ही मेरे

22हो” (मधुस्नेह) मेरा यह भाव चिरस्थायी रहे। हे नंदनंदन! “मैं भी

23तुम्हारा बनूँ” (घृत स्नेह) इस भाव को तो मैं स्वप्न में भी नहीं

24चाहता। हे मेरे नाथ! मेरी तुमसे अनुनय है-तुम मुझे स्वप्न में भी

25कभी सांसारिक सुख (ब्रह्मलोक पर्यन्त) प्रदान न करना। पुनरागति

26होने के कारण इन लोकों के सुख से आत्मा संतुष्ट नहीं होती।

27सांसारिक सुख जीव को तुमसे विमुख कर देते हैं। कुन्ती ने कहा

28था—

29विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।

30भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥

31जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान्।

32नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिंचन गोचरम्॥

33हे श्यामसुन्दर! मैं मुक्ति का सुख भी नहीं चाहता, कारण-

34मुक्ति में सेवक-सेव्य भाव ही समाप्त हो जाता है। बूँद समुद्र में

35मिलकर समुद्र ही बन गई तब उस बूँद का पृथक् अस्तित्व ही

36समाप्त हो गया। गोपियाँ कहती हैं-यद्यपि हम स्वीकार करती हैं

37कि श्रीकृष्ण और ब्रह्म एक ही हैं परन्तु हमें अद्वैत प्रिय नहीं।

38मान्यो हम कान्ह ब्रह्म एक,

39तऊ हमें भावति न भावना अन्यारी की।

40जइहैं बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की,

41बूँदता बिलैहै बूँद बिबस बिचारी की

42प्रेम का रसास्वादन द्वैत में ही सम्भव है। पुनः भक्त कहता है-

43हे मेरे प्रेमधन! मुझे तो बैकुण्ठ का सुख भी प्रिय नहीं प्रतीत होता,

44कारण- वहाँ लीला-सौरस्य का अभाव है। ब्रज-रस का आस्वादन

45बैकुण्ठ-वासी नहीं कर सकते। द्वारिका एवं मथुरा के प्रिय-जन

46भी ब्रजरस के प्रति उत्कंठित ही बने रहे।

47सबै सरस रस द्वारिका, मथुरा अरु ब्रज माहिं।

48मधुर, मधुरतर, मधुरतम, रस ब्रज रस सम नाहिं॥

49[भक्ति शतक]

50कृपालुजी कहते हैं अतः हे ब्रजेन्द्र कुमार! हमें तो ब्रजरस की

51ही लालसा है। तुम अपनी इच्छानुसार जब भी कृपा करो तब हमें

52ब्रजरस ही प्रदान करना।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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