# काहे चोरा चित मोरा भोरा भारा छलिया,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-005
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 25–27



<a id="line-1"></a>काहे चोरा चित मोरा भोरा भारा छलिया,  
<a id="line-2"></a>तोरा मैंने क्या किया बुरा बता दे छलिया।  
<a id="line-3"></a>चित तो था सदा का ही साथी मोरा छलिया,  
<a id="line-4"></a>रही मेरी जमा पूँजी चित में ही छलिया।  
<a id="line-5"></a>जो जो किये मैंने सुकृत सदा ते छलिया,  
<a id="line-6"></a>चित में ही वह सबरो धरा था छलिया।  
<a id="line-7"></a>किये जो जो पाप मैंने सदा ही ते छलिया,  
<a id="line-8"></a>चित के ही साथ छिना सोउ सब छलिया।  
<a id="line-9"></a>चित में ही रहे मेरे तीनों गुण छलिया,  
<a id="line-10"></a>सोउ लिया किया मोहिं निर्गुण छलिया।

<a id="line-11"></a>रहे चित में ही माता, पिता, सुत छलिया,  
<a id="line-12"></a>सोउ गये चित सँग क्या किया रे छलिया।  
<a id="line-13"></a>चित बिनु यह तनु तो है माटी छलिया,  
<a id="line-14"></a>चित सँग गइँ सब इंद्रिहुँ छलिया।  
<a id="line-15"></a>चित तो था एक ही न था अनेक छलिया,  
<a id="line-16"></a>दे दे चित या “कृपालु” ले ले प्राण छलिया।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-17"></a>भावार्थ—कोई गोपी श्रीकृष्ण को लक्ष्य कर कह रही है-अरे  
<a id="line-18"></a>भोले भाले प्रतीत होने वाले नटखट! भला मैंने, तुम्हारा क्या बिगाड़ा  
<a id="line-19"></a>था? जब से जीवात्मा है तब से चित्त भी उसके साथ जुड़ा हुआ  
<a id="line-20"></a>है। कर्म संस्कार चित्त में ही एकत्रित रहते हैं। मैंने जो शुभ कर्म  
<a id="line-21"></a>किये थे वे चित्त के द्वारा ही किये गये थे। अशुभ कर्म भी चित्त  
<a id="line-22"></a>द्वारा ही किये जाते हैं। हे चित्तचोर! तुमने मेरा चित्त क्या चुराया,  
<a id="line-23"></a>मेरे शुभ-अशुभ कर्मों की पूंजी ही चुरा ली-बिना चित्त के कर्म  
<a id="line-24"></a>भी नहीं बन सकता। वस्तुतः श्रीकृष्ण अत्यन्त ही दयामय हैं, जिस  
<a id="line-25"></a>पर कृपा करके उसका चित्त चुराते हैं उसे सदा के लिये कर्म बंधन  
<a id="line-26"></a>से मुक्त कर देते हैं। माया के तीनों गुण भी चित्त में ही रहते हैं,  
<a id="line-27"></a>जब चित्त चुराया गया तो चित्त के साथ ही चित्त में रहने वाले  
<a id="line-28"></a>सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण भी चले गये। जीव निर्गुण अर्थात् माया  
<a id="line-29"></a>के गुणों से रहित हो गया। संसारी माता, पिता, पुत्र आदि भी चित्त  
<a id="line-30"></a>में ही रहते हैं। चित्त के लुटने पर वे भी जीवात्मा का साथ छोड़  
<a id="line-31"></a>गये। चित्त के बिना शरीर जड़ सा ही है। इन्द्रियाँ मन के अधीन  
<a id="line-32"></a>होकर ही कार्य करती हैं। चित्त के चले जाने पर उन्होंने भी शरीर  
<a id="line-33"></a>का साथ छोड़ दिया। अब मन इन्द्रियों से रहित शरीर केवल मृत्तिका

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-34"></a>मात्र ही रह गया। हे छलिया कृष्ण! मन तो एक ही होता है; वह  
<a id="line-35"></a>भी तुमने ले लिया अब शरीर की चेष्टाएँ भी किस प्रकार हों,  
<a id="line-36"></a>कृपालुजी कहते हैं अब तुम मेरे प्राणों को भी ले लो अन्यथा मेरे  
<a id="line-37"></a>चित्त को लौटा दो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
