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और शृंगार माधुरी ही नहीं है। सिद्धान्त पक्ष का भी समावेश है।
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1और शृंगार माधुरी ही नहीं है। सिद्धान्त पक्ष का भी समावेश है।
2पाठकों को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि सभी पदों का भावार्थ भी साथ
3में लिखा गया है।
4श्यामा श्याम गीत
5ब्रजरस से आप्लावितश्यामा श्याम गीतजगद्गुरु श्री
6कृपालु जी महाराज की एक ऐसी रचना है ,जिसके प्रत्येक
7दोहे में रस का समुद्र ओतप्रोत है। इस भयानक भवसागर
8में दैहिक,दैविक, भौतिक दुःख रूपी लहरों के थपेड़ों से
9जर्जर हुआ, चारों ओर से स्वार्थी जनों रूपी मगरमच्छों
10द्वारा निगले जाने के भय से आक्रान्त,अनादिकाल से विशुद्ध
11प्रेम व आनन्द रूपी तट पर आने के लिये व्याकुल,असहाय
12जीव केलिये श्रीराधाकृष्ण की निष्काम भक्ति ही सरलतम एवं श्रेष्ठतम मार्ग
13है। उसी पथ पर जीव को सहज ही आरूढ़ कर देने की शक्ति जगद्गुरु श्री
14कृपालु जी महाराज की इस अनुपमेय रसवर्षिणी रचना में है,जिसे आद्योपांत
15भावपूर्ण हृदय से पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे रस की वृष्टि प्रत्येक दोहे
16के साथ तीव्रतर होती हुई अंत में मूसलाधार वृष्टि में परिवर्तित हो गई हो।
17श्रीराधाकृष्ण की अनेक मधुर लीलाओं का सुललित वर्णन हृदय को सहज ही
18श्यामा श्याम के प्रेम से सराबोर कर देता है। अधिक क्या कहा जाय,“श्यामा
19श्याम गीत”सरल भाषा,मधुरतम भाव व गेय पदावली की एक ऐसी त्रिवेणी
20है,जिसमें अवगाहन करके ही भावुक महानुभाव इसकी लोकोत्तर रमणीयता
21का यत्किंचित् रसास्वादन एवं जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के
22“भक्तियोगरसावतार” स्वरूप की एक झलक प्राप्त कर सकेंगे।