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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सुनु सुनु सुनु माँ श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

Reading 108 of 119 · Source no. 97 · Source PDF 194–196

1सुनु सुनु सुनु माँ श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

2तोसों विमुख रह्यो नित श्यामा,

3तव मायावश श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

4याते भूल्यो “को मैं, श्यामा,

5मान्यो जग निज श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

6यह भी भूल्यो “तुम मम श्यामा,

7हौँ हौँ तुम्हरो श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

8तनु के संबंधिन सों श्यामा,

9जोर्यो नातो श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

10उनहिँन संबंधिन सों श्यामा,

11माँग्यो सुख नित श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

12सुख तो पायो लेश न श्यामा,

13दुख पायो अति श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

14रसिक कृपा अब जान्यों श्यामा,

15जग स्वारथ रत श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

16भूमा सुख की स्वामिनि श्यामा,

17तुम हो, जाना श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

18आयो भीख माँगने श्यामा,

19द्वार तिहारे श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

20भुक्ति मुक्ति वैकुण्ठहुँ श्यामा,

21हौँ न चहौँ कछु श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

22चह निष्काम प्रेम तव श्यामा,

23जेहि दिय गोपिन श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

24चह तेरी सेवा या श्यामा,

25तव जन सेवा श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा।

26चह तव सुख में ही हो श्यामा,

27मम “कृपालु” सुख श्यामा, श्यामा श्यामा श्यामा॥

28भावार्थ—भक्त अपने हृदयोद्गार अपनी इष्ट देवी श्री

29राधा के प्रति प्रकट करते हुए कहता है- हे जगज्जननी किशोरी!

30तुम्हारी माया की अधीनता के कारण मैं अभी तक तुमसे विमुख

31रहा। इसी कारण मैं यह भूल गया कि मैं कौन हूँ। स्वरूप को

32भूल जाने के कारण मैंने जगत् को अपना मान लिया। मैं यह

33भूल गया कि आत्मा का सम्बन्ध एकमात्र तुमसे ही है। मैं

34तुम्हारा हूँ, तुम मेरी हो इस सिद्धांत को भूल जाने से मैंने शरीर

35के सम्बंधियों से ही सम्बंध जोड़ा। शरीर के सम्बंधियों से ही

36आत्मा का सुख माँगता रहा। सुख के स्थान पर मुझे दुःख ही

37दुःख प्राप्त हुआ। रसिकों की कृपा से अब मुझे यह ज्ञात हुआ

38कि संसार तो स्वार्थ की पूर्ति हेतु ही है। हे राधे! तुम्हारी कृपा

39से मुझे अब यह ज्ञान हो गया कि अनन्त आनन्द की स्वामिनी

40तो तुम हो। अब मैं तुम्हारे द्वार पर आनन्द की भिक्षा माँगने

41आया हूँ। हे राधे! मुझे सांसारिक भोग मुक्ति एंव वैकुण्ठ नहीं

42चाहिये। मुझे तो तुम्हारा वही निष्काम प्रेम जो तुमने ब्रजगोपियों

43को प्रदान किया चाहिये। मुझे तुम्हारी अथवा तुम्हारे जनों की

44सेवा चाहिये।“कृपालु”कहते हैं- हे श्री राधे! मैं सदा तुम्हारे

45सुख में ही अपना सुख मानूँ।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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