Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
हरि लै गयो सोइ, मम प्रान सखी।
Reading 109 of 119 · Source no. 98 · Source PDF 196–197
1हरि लै गयो सोइ, मम प्रान सखी।
2जो प्रान प्रान हैं कान्ह सखी।
3रहि करत यमुन असनान सखी।
4तहँ आयो औचक कान्ह सखी।
5वाने टेरी मुरलिहिँ तान सखी।
6हरि लियो मम तन मन प्रान सखी।
7मोहिं नहिं रह जब कछु भान सखी।
8गिरि मुर्छित कहि ““हा कान्ह,, सखी।
9जल गहिरे बूड़ी सब जान सखी।
10इतने में कूद्यो सोइ पिय कान्ह सखी।
11जल ही में चिपटायो मोहिं कान्ह सखी।
12दियो अस रस भयो मोहिं भान सखी।
13जल ही में मैंने लियो पिय मान सखी।
14कहा होगो आगे यह नहिं जान सखी।
15तेरो प्रान हैं “कृपालु” सो तो कान्ह सखी।
16तू भी दे दे निज तन मन प्रान सखी॥
17भावार्थ—किसी ब्रजगोपी ने अपनी सखी से कहा-
18अरी सखी! प्राणों के प्राण कृष्ण ने मेरे प्राण हरण कर लिये। मैं
19यमुना में स्नान कर रही थी, अचानक कृष्ण वहाँ आ गये।
20उन्होंने मुरली की तान छेड़ दी। मुरली की ध्वनि ने तो मेरे तन,
21मन, प्राण सभी छीन लिये। जब मुझे सुध बुध नहीं रही तब
22“हा कृष्ण” कहकर मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। अन्य सखियों ने
23समझा कि मैं गहरे जल में कूद गई हूँ। कृष्ण भी जल में कूद
24पड़े। उन्होंने जल के भीतर ही मेरा आलिंगन किया। उस रस
25को पाकर मुझे चेतना हुई। मैंने जल को साक्षी कर उन्हें अपना
26प्रियतम स्वीकार कर लिया। भविष्य में क्या होगा, यह मैं नहीं
27जानती।“कृपालु”सखी से कहते हैं- वह कृष्ण तेरा प्राण-
28स्वरूप है, तू भी अपना तन, मन, प्राण उसे अर्पण कर दे।