Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सुनु अनहोनी होनी भई आजु सखी।
Reading 110 of 119 · Source no. 99 · Source PDF 198–199
1सुनु अनहोनी होनी भई आजु सखी।
2नहिं तोसों मैं छिपावूँ कछु आजु सखी।
3मैं तो दधि बेचन गइ आजु सखी।
4सँग रहिँ औरहुँ सखि आजु सखी।
5इतने में आयो तहँ पिय आजु सखी।
6वाने कही मोते इत को आ आजु सखी।
7परी किरकिरि मम दृग आजु सखी।
8टुक दे निकारि किरिकिरि आजु सखी।
9मैंने देखी जाके वाके दृग आजु सखी।
10न थी किरकिरि दृग वाके आजु सखी।
11पुनि वाने अस मारी आँखि आजु सखी।
12मैं तो भई मतवारी लखि आजु सखी।
13जब गिरन लगी छिति आजु सखी।
14तब पकरि लियो वाने आजु सखी।
15लहि रस अस परसन आजु सखी।
16वारी तन मन प्रानन आजु सखी।
17जनि तू “कृपालु” फूली फिरे आजु सखी।
18तूने अपना गमाया सब आजु सखी॥
19भावार्थ—किसी गोपी ने अपनी अन्तरंग सखी को
20आपबीती सुनाई। ब्रज गोपी ने कहा-हे सखी! आज तो अनहोनी
21हो गई। मैं तुझसे कुछ भी छिपाउँगी नहीं। मैं आज कुछ सखियों
22के साथ दही बेचने गई थी। वहां नंदनंदन आ गये। वे मुझसे
23बोले- सखी! तनिक मेरे समीप आना। मेरी आँख में कंकड़
24गिर गया है, तू उसे निकाल दे। मैं उनके नेत्र खोलकर निकालने
25लगी। मुझे नेत्र में कंकड़ तो नहीं दिखा। उन्होंने तभी कटाक्षपात
26किया। मैं अपनी सुध बुध भूलकर मतवाली हो गई। बेसुध
27होकर जब पृथ्वी पर गिरने लगी तब यशोदानंदन ने अपने हाथों
28से मुझे पकड़ लिया। उस स्पर्श में इतना रस था कि मैंने अपना
29तन, मन, प्राण निछावर कर दिया।“कृपालु”सखी के प्रति
30कहते हैं- तू इस आनन्द को पाकर गर्व मत कर। आज तुझे
31प्राप्त नहीं हुआ तेरा सब कुछ नष्ट हो गया है।