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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

श्याम पियत रस राधे, राधे राधे राधे।

Reading 107 of 119 · Source no. 96 · Source PDF 193–194

1श्याम पियत रस राधे, राधे राधे राधे।

2सोवत जागत ध्यावत राधे,

3मन भावत छवि राधे, राधे राधे राधे।

4नहिं बिसरति आधे पल राधे,

5रोम रोम रम राधे, राधे राधे राधे।

6लखन चहत नित छविनिधि राधे,

7निर्निमेष दृग राधे, राधे राधे राधे।

8परस चहत नित तनु तनु राधे,

9रहि न सकत बिनु राधे, राधे राधे राधे।

10नासा चह सुगंध तनु राधे,

11मादन रसयुत राधे, राधे राधे राधे।

12रसना चह चरणामृत राधे,

13सरस सुधा रस राधे, राधे राधे राधे।

14सुनन चहत नित गुनगन राधे,

15नहिं अघात गुन राधे, राधे राधे राधे।

16यत्र तत्र सर्वत्रहिं, राधे,

17व्यापक भासें राधे, राधे राधे राधे।

18मुरलि “कृपालु” गाव नित राधे,

19राधे राधे राधे, राधे राधे राधे॥

20भावार्थ—श्यामसुन्दर सदैव ही राधा-रस-पान करते

21रहते हैं। राधा की मनभावनी छवि का ही सोते जागते ध्यान

22करते हैं। श्री राधा को ब्रजराज कुमार कभी आधे क्षण को भी

23भूल नहीं पाते। राधा तो उनके रोम-रोम में रम गई हैं। नंदनंदन

24के नेत्र अपलक रहकर निरन्तर ही राधा-रूप-माधुरी का दर्शन

25करना चाहते हैं। दिव्य शरीर से राधा के कोमल अप्राकृत शरीर

26का स्पर्श पाने को उत्कंठित ही बने रहते हैं। मादन भाव प्राप्त

27राधा के चिन्मय शरीर की मादक गंध को ग्रहण करने हेतु श्री

28कृष्ण की नासिका लालायित रहती है। श्री कृष्ण की भाग्यशालिनी

29जिह्वा श्री राधा के सरस चरणामृत के हेतु सदा अतृप्त ही बनी

30रहती है। प्रेमी कृष्ण के श्रवण सदा ही श्री राधा के दिव्य गुणों

31को सुनने के लिये अत्यन्त आतुर रहते हैं। सर्वव्यापक राधा का

32अनुभव उनके प्रियतम यत्र तत्र सर्वत्र ही करते हैं।“कृपालु”

33कहते हैं कि रसज्ञ श्री कृष्ण मुरली की तान छेड़कर उसमें भी

34राधा राधा नाम गाकर प्रफुल्लित होते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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