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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

मेरी ठकुरानी रानी राधे, राधे राधे राधे।

Reading 104 of 119 · Source no. 93 · Source PDF 187–188

1मेरी ठकुरानी रानी राधे, राधे राधे राधे।

2जेहि डर डरे डर सोइ हरि राधे,

3डरे डर मानिनि राधे, राधे राधे राधे।

4जेहि भज ब्रह्मादिक सोइ राधे,

5हरि भज निशि दिन राधे, राधे राधे राधे।

6जेहि गुन गावति नित श्रुति राधे,

7सोइ गावत गुन राधे, राधे राधे राधे।

8जेहि ध्यावत सनकादिक राधे,

9सोइ ध्यावत छवि राधे, राधे राधे राधे।

10जेहि पद रज चह शिव शुक राधे,

11सोइ चह पद रज राधे, राधे राधे राधे।

12जेहि लखि मोहे मदनहुँ राधे,

13सोइ मोहे लखि राधे, राधे राधे राधे।

14जेहि पग चापत कमला राधे,

15सोइ चापत पग राधे, राधे राधे राधे।

16जेहि जय बोलत सब जग राधे,

17सोइ जय बोलत राधे, राधे राधे राधे।

18जेहि कृपालु कह हरि हर राधे,

19सोइ “कृपालु” कह राधे, राधे राधे राधे॥

20भावार्थ—मेरी स्वामिनी तो राधा रानी हैं। जिन श्री

21हरि के भय से भय भी भयभीत होता है, वे ही मानिनी राधा के

22भय से भयभीत हो जाते हैं। जिन हरि की सेवा ब्रह्मा आदि

23श्रेष्ठ देवगण करते हैं, वे ही सर्वसेव्य श्री हरि रात-दिन अपनी

24आराध्या राधा का सेवन करते हैं एवं सतत् राधा-गुण-गान

25करते रहते हैं। जिन श्री कृष्ण का ध्यान सनक आदि परमहंस

26गण करते हैं, वे ही श्री कृष्ण श्री राधा की दिव्य रूप-माधुरी

27का ध्यान करते हैं। शिव एवं शुकदेव जैसे ज्ञानी जिनकी चरण-

28रज की कामना करते रहते हैं, वे सर्वेश्वर कृष्ण सदैव राधा

29चरण-रज के लिये लालायित रहते हैं। जिसे देखकर

30सौन्दर्याभिमानी कामदेव भी मोहित हो गया, वही पुरुषोत्तम

31राधा की अप्राकृत शोभा को देखकर मुग्ध हो गया। महालक्ष्मी

32अपने अत्यन्त सुकुमार करों से जिनके कोमल चरणों का संवाहन

33करने में संकुचित होती हैं, वे ही परम प्रेमी प्रभु अपने कमल-

34कोमल करों से सुकुमारी राधा के चरणों का संवाहन करने में

35अपने सौभाग्य की सराहना करते हैं। सारा विश्व जिनकी जय

36जयकार करता है वे श्री राधा का स्वागत सम्मान प्रदर्शित करते

37हुए उनकी जय जयकार करते हैं। विष्णु एवं शिव जिसकी

38कृपा का ओर छोर नहीं प्राप्त कर पाते वे“कृपालु”हरि श्री

39राधा की कृपा का बखान करते रहते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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