Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मो सम पतित न राधे, राधे राधे राधे।
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1मो सम पतित न राधे, राधे राधे राधे।
2पतितपावनी भी तो राधे,
3तुम सम नहिं कोउ राधे, राधे राधे राधे।
4सुर नर मुनि सबही हैं राधे,
5स्वारथरत नित राधे, राधे राधे राधे।
6पुनि वे भी मायावश राधे,
7बने पतित नित राधे, राधे राधे राधे।
8श्यामहुँ समदर्शी हैं राधे,
9न्याय करत नित राधे, राधे राधे राधे।
10तुम बिनु हेतु सनेहिनि राधे,
11कहत रसिकजन राधे, राधे राधे राधे।
12आयो द्वार तिहारे राधे,
13इहै आस लै राधे, राधे राधे राधे।
14हमरी सिगरी बिगरी राधे,
15बनि जैहैं अब राधे, राधे राधे राधे।
16परम विचित्र पतित हौं राधे,
17पतित न मानत राधे, राधे राधे राधे।
18दैन्य भाव नेकहुँ नहिँ राधे,
19अति अभिमानी राधे, राधे राधे राधे।
20लो अपनाय कृपालुहिं राधे
21अति “कृपालु” तुम राधे, राधे राधे राधे॥
22भावार्थ—भक्त ठकुरानी राधा से कहता है- हे राधे! मेरे
23समान कोई पापी नहीं है, किंतु तुम्हारे समान कोई पतितपावनी भी
24तो नहीं है। सुर, नर, मुनि सभी स्वार्थरत हैं,
25सुर नर मुनि सबकी यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।
26मायाधीन होने के कारण ये सभी पतित ही हैं। श्यामसुन्दर समदर्शी
27होने के कारण न्याय कर सकते हैं किंतु तुम बिना कारण के ही
28प्रेमदान देती हो। ऐसा सभी रसिकजन कहते हैं। इसी आशा को
29लेकर तुम्हारे द्वार पर आ गया हूँ। तुम्हारी कृपा से मेरी बिगड़ी भी
30बन जायगी। मैं ऐसा पतित हूँ जो स्वयं को पतित नहीं मानता मैं
31दीनता से तो परिचित ही नहीं। अत्यन्त अभिमानी हूँ। तुम अत्यन्त
32कृपामयी हो, अतः“कृपालु”को भी अपना लो।