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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

महल टहल दे राधे, राधे राधे राधे।

Reading 103 of 119 · Source no. 92 · Source PDF 185–187

1महल टहल दे राधे, राधे राधे राधे।

2हौं नहिं चहत कर्मफल राधे,

3सप्त स्वर्ग सुख राधे, राधे राधे राधे।

4हौं नहिं चहत योगफल राधे,

5अष्ट सिद्धि निधि राधे, राधे राधे राधे।

6हौं नहिं चहत ज्ञान फल राधे,

7मुक्ति आदि सुख राधे, राधे राधे राधे।

8हौं नहिं चह बैकुण्ठहुँ राधे,

9सुख अनंत जहँ, राधे, राधे राधे राधे।

10नहिं चह द्वारवतिहुँ रस राधे,

11जहँ वैभव सुख राधे, राधे राधे राधे।

12नहिं चह मथुराहूँ रस राधे,

13नहिं ब्रजरस तहँ राधे, राधे राधे राधे।

14हौं तो चह नित ब्रजरस राधे,

15जेहि सम रस नहिं राधे, राधे राधे राधे।

16मोहिं “कृपालु” बनवा दे राधे,

17महल टहलिनी राधे, राधे राधे राधे॥

18भावार्थ—भक्त अपनी स्वामिनी श्रीराधा से प्रार्थना

19करता है- हे श्री राधे! मुझे अपने महल की निजी सेवा प्रदान

20करो। अपने शुभ कर्मों के फल-स्वरूप सात स्वर्गों का सुख

21मुझे नहीं चाहिये। योगी-जन योग की सिद्धि, स्वरूपा आठ

22प्रकार की सिद्धियाँ एवं नौ निधियाँ जो प्राप्त करते हैं, उनमें

23भी मेरी रुचि नहीं है। ज्ञान के फलस्वरूप जो मुक्ति का सुख

24ज्ञानियों को प्राप्त होता है, वह भी मैं नहीं चाहता। यहाँ तक

25कि माया से परे वैकुण्ठ धाम का अनन्त सुख भी मैं नहीं चाहता।

26द्वारिका का ऐश्वर्य-युक्त सुख भी मुझे नहीं भाता। जिस मथुरा

27के वैभव में ब्रजरस का माधुर्य नहीं है, उसकी वांछा भी मैं

28नहीं करता। जिस ब्रजरस के समान अन्य कोई रस नहीं है

29उसी ब्रजरस की वासना निरन्तर मेरे मन में रहती है।“कृपालु”

30के शब्दों में हे राधे! तुम्हारे विलास भवन की एक क्षुद्र सेविका

31बनूँ, ऐसी मेरी कामना है। मेरी इस कामना की पूर्ति तुम्हारे

32द्वारा ही होगी।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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