लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

आ माँ निज शिशु ढिग श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

Reading 95 of 119 · Source no. 84 · Source PDF 171–173

1आ माँ निज शिशु ढिग श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

2तू तो पुत्र वत्सला श्यामा,

3हौँ कुपूत तव श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

4ज्यों जग महँ कोऊ शिशु श्यामा,

5जान न निज माँ श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

6त्यों हौं हूँ तव महिमा श्यामा,

7जानि सक्यों नहिं श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

8तनु की माँ माना माँ श्यामा,

9तव मायावश श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

10कह श्रुति अरु तव जन माँ श्यामा,

11मन बुधि पर तू श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

12बिनु तव अनुकंपा माँ श्यामा,

13नहिं जान्यो कोउ श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

14“यमेवैषवृणुते,” श्रुति श्यामा,

15भाव इहै कह श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

16द्वार लक्ष चौरासी श्यामा,

17घूम्यो पुनि पुनि श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

18अब लौँ मोह निशा में श्यामा,

19सोया था मैं श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

20गुरु ने मोहिं जगाया श्यामा,

21अब नहिं सोऊँ श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

22मैं हूँ अंश तिहारो श्यामा,

23तू मम स्वामिनि श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा।

24न्याय “कृपालु” चहत नहिं श्यामा,

25कृपा चहत तव श्यामा, श्यामा मेरी श्यामा॥

26भावार्थ—भक्त श्री राधा के प्रति कहता है- हे श्यामा

27माँ! अपने पुत्र के निकट आओ। तुम तो पुत्र के प्रति वात्सल्य

28रखने वाली हो किंतु मैं तो कुपुत्र हूँ। जिस प्रकार संसार में

29नवजात शिशु अपनी माँ को नहीं जानता, उसी प्रकार से मैं भी

30तुम्हारी महिमा को नहीं जान सका। तुम्हारी माया से भ्रमित

31होकर मैंने शरीर की माँ को ही अपनी माँ समझा। वेद एवं संत

32ऐसा कहते हैं कि तुम मन एवं बुद्धि से परे हो। तुम्हारी कृपा

33के बिना तुम्हें कोई भी जान नहीं सका है, वेद के““यमेवैष

34वृणुते””मंत्र का यही भाव है। अब तक मैं बार बार चौरासी

35लाख योनियों में भटकता रहा। अज्ञान की अंधकारमयी रात्रि में

36मैं सोया रहा। गुरु द्वारा जगाये जाने पर अब मैं नहीं चाहता कि

37पुनः मुझ पर अज्ञान हावी हो। मैं तुम्हारा अंश हूँ, तुम मेरी

38स्वामिनी हो। मैं तुमसे न्याय की याचना नहीं करता, मैं तो

39तुम्हारी कृपा चाहता हूँ।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version