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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

चह बस ब्रजरस राधे, राधे मेरी राधे।

Reading 96 of 119 · Source no. 85 · Source PDF 173–175

1चह बस ब्रजरस राधे, राधे मेरी राधे।

2नहिं चह भव वैभव रस राधे,

3सोउ विष मिश्रित राधे, राधे मेरी राधे।

4नहिं चह सात स्वर्ग रस राधे,

5सोउ दुख मिश्रित राधे, राधे मेरी राधे।

6नहिं चह ब्रह्मलोक रस राधे,

7सोउ मायिक रस राधे, राधे मेरी राधे।

8अपवर्गहुँ रस नहिं चह राधे,

9तुम न मिलहु तहँ राधे, राधे मेरी राधे।

10नहिं चह वैकुण्ठहुँ रस राधे,

11अति वैभवयुत राधे, राधे मेरी राधे।

12नहिं चह द्वारवतिहुँ रस राधे,

13सोउ वैभवयुत राधे, राधे मेरी राधे।

14नहिं चह मथुराहूँ रस राधे,

15तहहुँ न ब्रजरस राधे, राधे मेरी राधे।

16हौँ चह वृन्दावन रस राधे,

17मधुर मधुरतम राधे, राधे मेरी राधे।

18वारौँ कोटि ब्रह्मसुख राधे,

19ब्रजरस बिंदुहिँ राधे, राधे मेरी राधे।

20आयो पूर्णब्रह्म हरि राधे,

21ब्रजरस हित ब्रज राधे, राधे मेरी राधे।

22आनँदकंद नंदसुत राधे,

23रोवत कहि हा राधे, राधे मेरी राधे।

24टुक “कृपालु” दे ब्रजरस राधे,

25जो दिय रसिकन राधे, राधे मेरी राधे॥

26भावार्थ—हे राधे! मैं तो केवल ब्रजरस की ही लालसा

27रखता हूँ । मुझे संसार का वैभव नहीं चाहिये। उसमें तो विष

28मिला हुआ है। सातों स्वर्गों का सुख भी मैं नहीं चाहता, उसमें

29भी दुःख मिला हुआ है। ब्रह्मलोक की प्रतिष्ठा भी मैं नहीं

30चाहता क्योंकि वहाँ भी माया का आधिपत्य है। मुक्ति का सुख

31भी मुझे नहीं चाहिये; क्योंकि एकत्व हो जाने पर तुम्हारे दर्शन

32आदि का सुख कैसे प्राप्त हो सकेगा। वैकुण्ठ के ऐश्वर्य में भी

33मुझे रस की अनुभूति नहीं हो सकेगी। मथुरावासी जिस रस का

34अनुभव करते हैं- ब्रजरस से रहित होने के कारण मुझे वह भी

35प्रिय नहीं प्रतीत होता। मुझे तो सर्वाधिक मधुरतम वृन्दावन रस

36ही प्रदान करो। ब्रजरस के बिंदु मात्र पर करोड़ों ब्रह्मसुख निछावर

37किये जा सकते हैं। ब्रजरस की प्राप्ति के हेतु तो पूर्णतम पुरुषोत्तम

38श्री कृष्ण भी ब्रजमंडल में पधारे। आनन्दमय नंदनंदन ब्रजरस

39की प्राप्ति के हेतु ““हा राधे”” कहकर रो पड़ते हैं।“कृपालु”

40कहते हैं- हे राधे! तुमने अपने रसिक भक्तों को जो ब्रजरस

41प्रदान किया है, वह मुझे भी देने की कृपा करें।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version