Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
अपनी ओर लखु राधे, राधे मेरी राधे।
Reading 94 of 119 · Source no. 83 · Source PDF 169–171
1अपनी ओर लखु राधे, राधे मेरी राधे।
2बिनु कारण करुणा कर राधे,
3अस कह रसिकन राधे, राधे मेरी राधे।
4याते किन्तु परन्तु न राधे,
5अब लगाउ कछु राधे, राधे मेरी राधे।
6हौँ तो सदा सदा ते राधे,
7अहौँ विमुख तव राधे, राधे मेरी राधे।
8याते तव माया ने राधे,
9हर्यो ज्ञान मम राधे, राधे मेरी राधे।
10याते भयो सक्त जग राधे,
11भूल्यो निज सुधि राधे, राधे मेरी राधे।
12पुनि पुनि लख चौरासी राधे,
13योनि भ्रम्यो नित राधे, राधे मेरी राधे।
14माया ते तो हारे राधे,
15विधि हरि हर हूँ राधे, राधे मेरी राधे।
16तुम ही मम जानत हौँ राधे,
17मानत नहिं मन राधे, राधे मेरी राधे।
18आपुन दोष दुरावत राधे,
19दोष देत तोहिं राधे, राधे मेरी राधे।
20तू साकार कृपा है राधे,
21करहु कृपा अब राधे, राधे मेरी राधे।
22पतित “कृपालु” पतित ते राधे,
23पतित पावनी राधे, राधे मेरी राधे॥
24भावार्थ—भक्त कहता है-श्री राधे अपने स्वभाव और
25सहज गुणों की तरफ ही देखकर मेरी भी बिगड़ी बना दो।
26तुम्हारे रसिक भक्त कहते हैं कि तुम बिना कारण के कृपा करती
27हो; अतः अब मेरी बार कृपा करने में किंतु परन्तु न लगाओ।
28मैं स्वीकार करता हूँ कि अनादि काल से मैं तुम्हारे प्रतिकूल ही
29आचरण करता रहा। तुमसे विमुख होने के कारण माया ने मेरे
30स्वरूप का ज्ञान भुला दिया। इसी कारण जगत् में आसक्त हो
31जाने के कारण मैं तुम्हारे दासत्व और निज आत्मस्वरूप को
32भूल गया। इसी कारण से मुझे सदा चौरासी लाख योनियों मे
33भटकना पड़ा। हे राधे! तुम्हारी माया से तो ब्रह्मा, विष्णु एवं
34शिव भी पराजित हो चुके हैं। मैं जानता तो हूँ कि केवल तुम
35ही मेरी हो परन्तु इस सत्य को हृदय से स्वीकार नहीं करता। मैं
36अपने दोष को छिपाकर तुमको ही दोष देता हूँ। हे माँ राधे!
37तुम कृपा की साक्षात् मूर्ति हो; अतः अब मुझ पर शीघ्र कृपा
38करो। हे पतितपावनी! मैं समस्त पतितों से अधिक पतित हूँ।