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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तेरी यारी में मैं मारी गई बनवारी,

Reading 68 of 119 · Source no. 57 · Source PDF 123–124

1तेरी यारी में मैं मारी गई बनवारी,

2ऐसी यारी पर बलिहारी बलिहारी।

3तूने कहा था है तू तो प्रानन प्यारी,

4जाके मधुपुरी भूला तू तो बनवारी।

5तोसों लबरा न कोइ जग बनवारी,

6मिठी बोलनि ठगे नित परनारी।

7तूने कहा था हैं साहूकार ब्रजनारी,

8मैं हूँ ऋणियाँ रहूँगा नित बनवारी।

9तूने कहा था न छोड़ूँ तोहिं बनवारी,

10जा जा कुब्जा बनाया निज घरवारी।

11तूने कहा था तू मेरी सब ते ही प्यारी,

12वह कहाँ गइ तेरी वाणी बनवारी।

13तोहिं लागे अब प्यारी कुबरिहिं नारी,

14बनि कुबरी सी हौंहुँ ऐहौं बनवारी।

15तू न जाने प्यार वार कछु बनवारी,

16तू है ठग ठगे भोरी भारी ब्रजनारी।

17तोहिं भावे जोइ सोइ करु बनवारी,

18तेरी थी “कृपालु” रहेंगी भी ब्रजनारी॥

19भावार्थ—कोई गोपी प्रणय-वश श्रीकृष्ण पर व्यंग्य

20करती है- हे वनों में विचरण करने वाले गोविंद! तुमसे प्रीति

21जोड़कर मैं तो कहीं की भी नहीं रही। तुम्हारी प्रीति-रीति की

22बलिहारी है। जब तुम्हें मुझसे सम्बन्ध जोड़ना था तब तुम मुझे

23अपनी प्राणाधिक प्रिया कहकर सम्मान प्रदर्शन करते थे परन्तु

24मथुरा जाकर तुम सब कुछ भूल गये। तुम्हारे जैसा लम्पट कौन

25होगा? मधुर वाणी से सदा ही परस्त्रियों को धोखा देते रहते

26हो। तुम तो यह कहा करते थे कि गोपियाँ धनी हैं तुम उनके

27सदा ही ऋणी रहोगे। तुम यह भी कहते थे कि सदा गोपियों के

28साथ प्रेम का निर्वाह करोगे परन्तु कुब्जा को पाकर ब्रजांगनाओं

29को भूल गये। तुम तो बड़े सत्यवादी बनते हो किंतु तुम्हारी मेरे

30साथ की गई सब प्रतिज्ञायें मिथ्या सिद्ध हुईं। अब तो तुम्हें

31कुब्जा ही प्राणाधिक प्रिय है। मुझे भी कुब्जा जैसा रूप ही

32बनाकर तुम्हारे निकट आना पड़ेगा। तुम्हारी प्रीति-रीति झूठी

33है। वस्तुतः तुम तो ठग हो। भोली भाली ब्रज-गोपिकाओं को

34अपने प्रेमजाल में फँसाकर उन्हें धोखा देते हो। अब हमारे प्रेम

35का सिद्धान्त भी सुन लो। हम तुमसे प्रेम के व्यवहार की अपेक्षा

36नहीं करती। तुम्हारी जो इच्छा हो करो। ब्रज गोपियाँ तो तुम्हारी

37ही थीं और सदा तुम्हारी ही रहेंगी।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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