Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
धनि बनवारी तोरी यारी, यारी यारी यारी।
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1धनि बनवारी तोरी यारी, यारी यारी यारी।
2योगिन लखन चहत बनवारी,
3लखि न पाव छवि प्यारी, यारी यारी यारी।
4सोइ मधुपुरी जाय बनवारी,
5जोरत कुबरिहिं यारी, यारी यारी यारी।
6जेहि कह नेति नेति श्रुति चारी,
7विधि बुधिहूँ जहँ हारी, यारी यारी यारी।
8सोइ घर घर गारी ब्रजनारी,
9जात सुनन बनवारी, यारी यारी यारी।
10जेहि रस लगि कैलास बिहारी,
11बनि गये नर ते नारी, यारी यारी यारी।
12सोइ निकुञ्ज खोजत बनवारी,
13रो रो कहि हा प्यारी, यारी यारी यारी।
14जेहि रस हित करि करि तप हारी,
15रमा सरीखी नारी, यारी यारी यारी।
16सोइ “कृपालु” रस रास बिहारी,
17देत सखिन करि यारी, यारी यारी यारी।
18भावार्थ—भक्त रसिकता पूर्ण ढंग से अपने इष्ट की
19प्रेम-चर्चा पर प्रकाश डालते हुए कहता है- हे कृष्ण! तुम्हारी
20यारी को धन्य है। योगीजन अपने ध्यान में भी तुम्हारी मनोहारिणी
21मूर्ति का दर्शन नहीं कर पाते, वही तुम मथुरा में कंस की दासी
22कुब्जा से प्रीति करते हो। जिस ब्रह्म के लिये सम्पूर्ण वेद “नेति
23नेति” कहकर अपनी हार मान लेते हैं, वही परब्रह्म स्वरूप
24साकार ब्रह्म तुम नित्य ही ब्रज में गोपियों की प्रेम भरी गाली
25सुनने-हेतु उनके घरों में जाते हो। जिस रस-स्वरूप ब्रह्म की
26प्रीति में शिव नर से नारी बनें, वही रासेश्वर कृष्ण तुम “हा
27राधे!” कहकर निकुंजों में रासेश्वरी की खोज करते हो। महालक्ष्मी
28ने जिस रास-रस को प्राप्त करने के लिये ब्रज से बाहर ही
29खड़े रहकर घोर तप किया परन्तु प्राप्त नहीं कर सकीं। उसी
30दुर्लभ रास-रस को तुमने ब्रज-गोपियों को प्रीतिपूर्वक प्रदान
31किया। हे रासविहारी तुम्हारी प्रीति-रीति को धन्य हैं।