लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

इत को तो आना टुक कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 57 of 119 · Source no. 46 · Source PDF 103–105

1इत को तो आना टुक कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2तू तो करे सब की ही सेवा नित कान्हा,

3सखन सखिन कहँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4मम गोबर टोकरि टुक कान्हा,

5आजा उठवा दे कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6तव बाबा को न चाकर कह कान्हा,

7हूँ नँदराय सुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8सखि कह प्रति टोकरि दउँ कान्हा,

9माखन लोँदा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10हम दोउ गिनति न जानें कह कान्हा,

11भइ जित टोकरि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12सखि कह जेतिक टोकरि कान्हा,

13उठवैहौ सिर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14उतनेइ गोबर टीका कान्हा,

15दउँ तव गालन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16मानि गयो तब भोरो कान्हा,

17लार गिरी मुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18दोउ कपोल गोबर को कान्हा,

19टीका भरि गयो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20तव टीका दिये माथे कान्हा,

21पुनि कह चलु घर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

22घर दर्पण दिखाय मुख कान्हा,

23हँसीं सबै सखि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

24लखि “कृपालु” अस मुख छवि कान्हा,

25सर्वस वारौँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

26भावार्थ—एक सखी कृष्ण को देखकर कहती है-

27अरे कन्हैया! तनिक मेरे निकट तो आ। सभी ग्वाल बाल और

28गोपियाँ कहती हैं कि तू सबकी सेवा करता रहता है। मेरी भी

29गोबर की टोकरी तनिक उठवा दे। कृष्ण ने सखी को उत्तर

30दिया- मैं नंदराय का पुत्र हूँ तेरे बाप का नौकर तो नहीं हूँ जो

31तेरी टोकरी उठवा दूँ। सखी ने माखन प्रेमी को लोभ दिखाया।

32वह बोली- यदि तुम मेरी टोकरी उठवा दोगे तो प्रत्येक टोकरी

33उठवाने के मूल्य में तुम्हें एक माखन का लौंदा प्राप्त होगा।

34कन्हैया बोले-न तो तू ही पढ़ी है और न मैं ही पढ़ा हूँ, अतः

35मैंने कितनी टोकरी उठवाईं यह गिनेगा कौन? सखी ने समस्या

36का समाधान प्रस्तुत किया- कन्हैया! तुम जितनी टोकरी

37उठवाओगे, उतने ही गोबर के टीके मैं तुम्हारे गालों पर लगा

38दूँगी। माखन के लोभी भोले भाले कन्हैया को यह प्रस्ताव जँच

39गया। माखन प्राप्त करने की कल्पना से मुख में पानी भर आया।

40छोटे से कन्हैया के दोनों कपोल गोबर के टीके से भर गये।

41चतुर गोपी ने कृष्ण के छोटे से मस्तक पर भी गोबर का टीका

42लगा दिया। प्रेम से निज संकेत पर ब्रह्म को नचाने वाली ब्रजांगना

43ने भक्तवत्सल से घर चलने को कहा। जब कन्हैया उसके पीछे

44पीछे उसके घर पहुँचे तब उसने दर्पण में कन्हैया को उनका

45मुख दिखाया। अन्य सखियाँ भी उस अद्भुत छवि का दर्शन

46कर हँस पड़ी।“कृपालु”कहते हैं-कन्हैया की इस अनोखी

47झाँकी का दर्शन कर मैं अपना सर्वस्व निछावर करता हूँ।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version