# इत को तो आना टुक कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-046
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 103–105



<a id="line-1"></a>इत को तो आना टुक कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-2"></a>तू तो करे सब की ही सेवा नित कान्हा,  
<a id="line-3"></a>सखन सखिन कहँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-4"></a>मम गोबर टोकरि टुक कान्हा,  
<a id="line-5"></a>आजा उठवा दे कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-6"></a>तव बाबा को न चाकर कह कान्हा,  
<a id="line-7"></a>हूँ नँदराय सुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-8"></a>सखि कह प्रति टोकरि दउँ कान्हा,  
<a id="line-9"></a>माखन लोँदा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-10"></a>हम दोउ गिनति न जानें कह कान्हा,  
<a id="line-11"></a>भइ जित टोकरि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-12"></a>सखि कह जेतिक टोकरि कान्हा,  
<a id="line-13"></a>उठवैहौ सिर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-14"></a>उतनेइ गोबर टीका कान्हा,  
<a id="line-15"></a>दउँ तव गालन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-16"></a>मानि गयो तब भोरो कान्हा,  
<a id="line-17"></a>लार गिरी मुख कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-18"></a>दोउ कपोल गोबर को कान्हा,  
<a id="line-19"></a>टीका भरि गयो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-20"></a>तव टीका दिये माथे कान्हा,  
<a id="line-21"></a>पुनि कह चलु घर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-22"></a>घर दर्पण दिखाय मुख कान्हा,

<a id="line-23"></a>हँसीं सबै सखि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-24"></a>लखि “कृपालु” अस मुख छवि कान्हा,  
<a id="line-25"></a>सर्वस वारौँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-26"></a>भावार्थ—एक सखी कृष्ण को देखकर कहती है-  
<a id="line-27"></a>अरे कन्हैया! तनिक मेरे निकट तो आ। सभी ग्वाल बाल और  
<a id="line-28"></a>गोपियाँ कहती हैं कि तू सबकी सेवा करता रहता है। मेरी भी  
<a id="line-29"></a>गोबर की टोकरी तनिक उठवा दे। कृष्ण ने सखी को उत्तर  
<a id="line-30"></a>दिया- मैं नंदराय का पुत्र हूँ तेरे बाप का नौकर तो नहीं हूँ जो  
<a id="line-31"></a>तेरी टोकरी उठवा दूँ। सखी ने माखन प्रेमी को लोभ दिखाया।  
<a id="line-32"></a>वह बोली- यदि तुम मेरी टोकरी उठवा दोगे तो प्रत्येक टोकरी  
<a id="line-33"></a>उठवाने के मूल्य में तुम्हें एक माखन का लौंदा प्राप्त होगा।  
<a id="line-34"></a>कन्हैया बोले-न तो तू ही पढ़ी है और न मैं ही पढ़ा हूँ, अतः  
<a id="line-35"></a>मैंने कितनी टोकरी उठवाईं यह गिनेगा कौन? सखी ने समस्या  
<a id="line-36"></a>का समाधान प्रस्तुत किया- कन्हैया! तुम जितनी टोकरी  
<a id="line-37"></a>उठवाओगे, उतने ही गोबर के टीके मैं तुम्हारे गालों पर लगा  
<a id="line-38"></a>दूँगी। माखन के लोभी भोले भाले कन्हैया को यह प्रस्ताव जँच  
<a id="line-39"></a>गया। माखन प्राप्त करने की कल्पना से मुख में पानी भर आया।  
<a id="line-40"></a>छोटे से कन्हैया के दोनों कपोल गोबर के टीके से भर गये।  
<a id="line-41"></a>चतुर गोपी ने कृष्ण के छोटे से मस्तक पर भी गोबर का टीका  
<a id="line-42"></a>लगा दिया। प्रेम से निज संकेत पर ब्रह्म को नचाने वाली ब्रजांगना  
<a id="line-43"></a>ने भक्तवत्सल से घर चलने को कहा। जब कन्हैया उसके पीछे  
<a id="line-44"></a>पीछे उसके घर पहुँचे तब उसने दर्पण में कन्हैया को उनका  
<a id="line-45"></a>मुख दिखाया। अन्य सखियाँ भी उस अद्भुत छवि का दर्शन

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-46"></a>कर हँस पड़ी।“कृपालु”कहते हैं-कन्हैया की इस अनोखी  
<a id="line-47"></a>झाँकी का दर्शन कर मैं अपना सर्वस्व निछावर करता हूँ।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
