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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

काहे चित चोरा मोरा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 58 of 119 · Source no. 47 · Source PDF 105–106

1काहे चित चोरा मोरा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2चित तो था साथी सदा ते ही मम कान्हा,

3मैंने का बिगारा तोरा कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4मैंने भोरा भारा छोरा जाना तोहिं कान्हा,

5जाना न लुटेरा तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6इक बार ही तो देखा मैंने तोहिं कान्हा,

7देखना तो पाप नहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8पाप भी है तो है मम नैनन कान्हा,

9चित क्यों चुराया तूने कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10पप्पू करे पाप गप्पू फल भोगे कान्हा,

11ऐसा तो न होय कहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12दे दे मोरा चित सीधे-सीधे अब कान्हा,

13जो भल चह निज कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14मोरा चित ना दे जो तो कहूँ जाके कान्हा,

15तोरी चोरी प्यारी जू ते कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16सोच मन तब तेरो हाल बुरो कान्हा,

17करि देंगी राधारानी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18राधा रानी जब करें मान तब कान्हा,

19पग पकरैगो मम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20प्यारी ने “कृपालु” है चुराया चित कान्हा,

21याते सब चित चोरे कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

22भावार्थ—भक्त प्रेम की विचित्र भाषा में अपने प्रियतम

23से कह रहा है- हे कृष्ण! तुमने मेरा चित्त क्यों चुराया? मेरा

24चित्त अनन्त जन्मों से मेरा साथ दे रहा था, तुमने तो उस चित्त

25को ही चुरा लिया। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? मैंने तुम्हें

26भोला भाला समझा था, तुम तो लुटेरे निकले। मैंने तो तुम्हें

27केवल एक बार ही देखा था। क्या देखना भी पाप है? यदि

28पाप भी हुआ तो नेत्रों ने ही तो किया, तुमने मेरा चित्त क्यों चुरा

29लिया? यह तो ऐसा ही हुआ कि पप्पू पाप करे और गप्पू फल

30भोगे। ऐसा तो कहीं नही होता। हे कन्हैया! सीधे सीधे मेरा

31चित्त मुझे लौटा दो। यदि अपना भला चाहो तो दे दो, अन्यथा

32मैं श्री राधा रानी से तुम्हारे चोरी जारी के अवगुणों की बात कह

33दूँगी, तब तो तुम्हारा बुरा हाल होगा। जब श्री राधा रानी मान

34करेंगी तब तुम मेरे पैर पकड़ोगे।“कृपालु”कहते हैं- श्री राधा

35रानी ने तुम्हारा चित्त चुरा लिया है अतः तुम औरों के चित्त

36चुराते रहते हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version