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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कान्हा सम मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

Reading 53 of 119 · Source no. 42 · Source PDF 94–96

1कान्हा सम मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

2जननि यशोमति जायो कान्हा,

3लाल अनोखो कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

4अलसी सुमन वरन तन कान्हा,

5मदन विमोहन कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

6चुवत रोम प्रति ब्रजरस कान्हा,

7पियत रसिक रस कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

8मोर मुकुट अटपट सिर कान्हा,

9लट घुँघुरारी कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

10रसहुँ सरस रस लोचन कान्हा,

11चपल चपल ते कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

12रतन खचित श्रुति कुण्डल कान्हा,

13नासा बेसर कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

14गवनि विलोकनि मुसुकनि कान्हा,

15लखि अचरजयुत कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

16दुपटी लिपटी लकुटी कान्हा,

17गल कौस्तुभ मणि कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

18कर कनकन कंकन दुति कान्हा,

19कटि किंकिनि दुति कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

20चरन बजत नूपुर धुनि कान्हा,

21छूम छननननन कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

22ग्रीवा कटि पद टेढ़ी कान्हा,

23मुरलि अधर धर कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

24अस “कृपालु” रस अम्बुधि कान्हा,

25सखि कह कारो कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा॥

26भावार्थ—भक्त कहता है श्री कृष्ण के समान तो केवल

27श्री कृष्ण ही हैं। माता यशोदा ने कन्हैया को जन्म दिया वस्तुतः

28वह कृष्ण अनोखा ही था। उस यशोदा-नन्दन का दिव्य वपु

29अलसी पुष्प के समान श्याम वर्ण था। वह कन्हैया अपने

30अलौकिक रूप से कामदेव के मन को भी हरण करता था।

31कन्हैया के प्रत्येक रोम से ब्रज-रस की वर्षा होती थी, रसिक-

32जन उस मधुर रस का पान करते थे। कन्हैया के शीश पर

33अनोखा मोर-मुकुट सुशोभित था। यशोदा के अनुपम शिशु की

34घुँघराली लट मुख चन्द्र को घेरे रहती थीं। साक्षात् रस से भी

35अधिक रसपूर्ण नेत्र चंचलता से भी चंचल थे। रत्नों से जड़े हुए

36कुंडल कानों में शोभा पाते थे। नासिका बेसर से छवि पा रही

37थी। उस अनोखे शिशु की मन्द मन्द गति चपल चितवनि, एवं

38मुस्कान आश्चर्य से परिपूर्ण थीं। युगल स्कंध दुपट्टे से आच्छादित

39थे। लकुटी कर में शोभा पा रही थी। कण्ठ कौस्तुभ मणि से

40देदीप्यमान था। हाथों में कंकणों की दमक थी। सूक्ष्म कटि

41प्रान्त किंकिणी की जगमगाहट से परिपूर्ण था। कन्हैया के चरण-

42प्रान्त नूपुर की छूम छननन ध्वनि से झंकृत थे। ग्रीवा कमर एवं

43चरण की तिरछी भंगिमा रसिकों के मन को मोहती थी। अरुण

44अधरों पर मुरली विराजमान थी।“कृपालु”कहते हैं- ऐसे रस

45सागर कृष्ण को सखियाँ प्रेम-वश काला कहती हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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