लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कान्हा सम है छवि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 32 of 119 · Source no. 21 · Source PDF 54–55

1कान्हा सम है छवि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2ब्रजरस चुवत रहत नित कान्हा,

3रोम रोम तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4सो रस पियत रसिक नित कान्हा,

5तुम वंचित रह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6जो भी नर तव छवि लख कान्हा,

7भूलत तनु सुधि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8जो भी नारि लखति छवि कान्हा,

9तजि दे पतिव्रत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10जो भी पशु पक्षी लख कान्हा,

11बनि जाय जड़ जनु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12जो भी सुनत मुरलि धुनि कान्हा,

13भाजत तव ढिग कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14तेरे दर्शन हित शिव कान्हा,

15बने शिवानी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16उमा रमादि लखत तोहिं कान्हा,

17भूलीं निज पति कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18ज्ञानी तव दर्शन हित कान्हा,

19खरे वृक्ष बनि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20जा पर हो “कृपालु” तू कान्हा,

21सोइ देखे तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

22भावार्थ—भक्त कहता है- श्री कृष्ण की सौन्दर्य माधुरी

23श्री कृष्ण के ही समान है। उनके अंग प्रत्यंग से निरन्तर ब्रज-

24रस की वर्षा होती रहती है। उस रस का आस्वादन भक्त-जन

25ही करते हैं। श्री कृष्ण स्वयं अपने रूप-रस का पान नहीं कर

26पाते। कोई भी मनुष्य यदि कृष्ण-सौन्दर्य सुधा का पान कर

27लेता है तो वह अपनी सुध बुध भूल जाता है। यदि कोई स्त्री

28श्री कृष्ण के रूप का दर्शन कर लेती है तो तत्काल पतिव्रत-

29धर्म को त्याग देती है। जब कोई पशु-पक्षी श्री कृष्ण को देखता

30है तो वह स्तम्भित होकर जड़वत् प्रतीत होने लगता है। जब

31वंशीधर की वंशी बजती है तब वंशी के स्वर का ही अनुसरण

32करते हुए प्राणी स्वर के उद्गम-स्थल के निकट दौड़ा चला

33आता है। श्री कृष्ण-दर्शन की उत्कंठा ने भोलेनाथ को शिव से

34शिवानी बना दिया। पार्वती एवं महालक्ष्मी आदि सती शिरोमणि

35नारियाँ श्री कृष्ण का दर्शन प्राप्त कर शिव एवं महाविष्णु जैसे

36अपने पतियों को विस्मृत कर देती हैं। उद्धव जैसे ज्ञानी ब्रज में

37वृक्ष बनने की कामना करते हैं। अन्य परमहंस आदि भी श्री

38कृष्ण दर्शन की लालसा से वृक्ष आदि बने। श्री कृष्ण-कृपा के

39अभाव में कोई भी उनका दर्शन नहीं कर सकता। दर्शन तो

40कृपा-साध्य ही है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version