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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कैसे कहुँ तू कृपालु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 31 of 119 · Source no. 20 · Source PDF 52–53

1कैसे कहुँ तू कृपालु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2सुन्यो बिनु कारण कृपा करे कान्हा,

3पतितन पर नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4इमि कहि रसिक जनन तोहिं कान्हा,

5बड़ो बनायो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6पै गीतादि कहत तू कान्हा,

7चह निर्मल मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8मन का मल है माया कान्हा,

9त्रिगुणमयी तव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10श्रुति कह कृपा बिना तव कान्हा,

11जाय न माया कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12कोउ कह धर्म कर्म ते कान्हा,

13मन हो निर्मल कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14कोउ कह योगमार्ग ते कान्हा,

15चित्त शुद्ध हो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16कोउ कह ज्ञान मार्ग ते कान्हा,

17चित्त शुद्ध हो कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18कोउ कह नवधा भक्तिहिं कान्हा,

19करत दिव्य मन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20पै विद्या माया तो कान्हा,

21जाय न कैसेहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

22भक्ति अविद्या नासै कान्हा,

23जो रज तम गुण कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

24एक स्वरूप शक्ति तव कान्हा,

25नासै विद्या कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

26सार “कृपालु” एक है कान्हा,

27कृपा तिहारी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

28भावार्थ—भक्त कवि कहता है- हे कृष्ण! मैं कैसे

29कहूँ कि तू कृपालु है। मैंने संतों से सुना है कि तुम बिना कारण

30ही कृपा करते हो। पतितजन ही तुम्हारी कृपा के विशेष अधिकारी

31हैं; भक्तों ने ऐसा कह कह कर तुम्हें बड़ा बना दिया। गीता

32शास्त्र तो कहता है कि तुम शुद्ध मन चाहते हो। तुम्हारी त्रिगुणमयी

33माया ही मन को अशुद्ध करती है। वेद कहता है- तुम्हारी कृपा

34के बिना तुम्हारी माया नहीं जाती। कुछ संतजन कहते हैं कि

35नवधा भक्ति द्वारा मन को शुद्ध किया जा सकता है। विद्या माया

36तो साधन-भक्ति से भी दूर नहीं होती। भक्ति द्वारा अविद्या

37त्रिगुणमयी माया का ही नाश होता है। विद्या माया का नाश तो

38तुम्हारी स्वरूप शक्ति द्वारा ही होता है।“कृपालु”कहते हैं कि

39सबका सार यही है कि तुम्हारी कृपा से ही जीव माया से

40उत्तीर्ण हो सकता है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version