Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
यह अचरज सुनु कान्हा कान्हा कान्हा कान्हा।
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1यह अचरज सुनु कान्हा कान्हा कान्हा कान्हा।
2श्रुति ने ब्रह्म अजन्मा माना,
3सोइ जनमेउ बनि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4श्रुति ने जगत्पिता जेहि माना,
5बन्यो नंदसुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6श्रुति ने निराकार जेहि माना,
7सोइ धर नरतनु कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8श्रुति ने महाकाल जेहि माना,
9सोइ डर साँटिन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10श्रुति ने भूखरहित जेहि माना,
11छाछ माँग सोइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12श्रुति ने पूर्णकाम जेहि माना,
13करत रास सोइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14श्रुति ने आनँदघन जेहि माना,
15सोइ रोवत ब्रज कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16श्रुति ने जग स्वामी जेहि माना,
17सखिन दास सोइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18श्रुति ने नेति नेति जेहि माना,
19सोइ घोड़ा बन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20हौँ “कृपालु” अचरज नहिं माना,
21भक्तिवश्य रह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22भावार्थ—यह आश्चर्य है या कन्हैया है? वेद जिस
23ब्रह्म को अजन्मा कहता है वही ब्रह्म कृष्ण के रूप में जन्म
24धारण करता है। वेद जिसे जगत्पिता कहता है, वही नंद का
25पुत्र कृष्ण बना है। वेद ने जिसे निराकार ब्रह्म स्वीकार किया है
26उसी ने कृष्ण के रूप में मानव-शरीर धारण किया है। वेद
27जिसे महाकाल रूप मानता है वही यशोदा की साँटी देखकर
28भयभीत होता है, वेद कहता है- ब्रह्म को भूख प्यास नहीं
29लगती किंतु वही ब्रह्म कृष्ण गोपियों से छाछ की याचना करता
30है। वेद जिसे पूर्णकाम कहता है-वही ब्रह्म ब्रजगोपियों के साथ
31रास-विहार करता है। वेद जिसे आनन्दघन रूप बताता है, वही
32ब्रह्म ब्रज में सखाओं द्वारा खेल से निकाल दिये जाने पर रोता
33है। वेद जिसे सम्पूर्ण विश्व का स्वामी बताता है वही ब्रह्म
34कृष्ण ब्रजगोपियों की दासता करता है। वेद जिसकी महिमा का
35पूर्ण रूप से वर्णन करने में असमर्थ होकर ““नेति- नेति”” कहने
36लगता है। वह सखाओं को कंधे पर बिठाकर उनका घोड़ा
37बनकर ब्रजभूमि में दौड़ लगा रहा है।“कृपालु”कहते हैं-मैं
38इस आश्चर्य को आश्चर्य नहीं मानता। कारण श्री कृष्ण सदा
39भक्ति के वश में है।