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Yugal Ras

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

मन से तो सब हारे, हारे हारे हारे।

Reading 24 of 119 · Source no. 13 · Source PDF 39–40

1मन से तो सब हारे, हारे हारे हारे।

2विश्वामित्र पराशर सारे,

3मन ते सब ही हारे, हारे हारे हारे।

4योगी जपी तपी हैं हारे,

5हारे ऋषि मुनि सारे, हारे हारे हारे।

6हारे स्वर्गहुँ के सुर सारे,

7सुरपति इन्द्रहुँ हारे, हारे हारे हारे।

8आठों सिद्धि, नवों निधि वारे,

9हारे मन ते सारे, हारे हारे हारे।

10हारे जीवनमुक्तहुँ सारे,

11योगीजन भी हारे, हारे हारे हारे।

12मायाबद्ध जीव हैं सारे,

13चंचल मन ते हारे, हारे हारे हारे।

14माया ते हारे हैं सारे,

15याते मन ते हारे, हारे हारे हारे।

16बिनु हरि अनुकम्पा सब हारे,

17विधि हरि हरहूँ सारे, हारे हारे हारे।

18जिनके एकमात्र हरि प्यारे,

19वे मन ते नहिं हारे, हारे हारे हारे।

20हों “कृपालु” तोहिं जब हरि प्यारे,

21तोसों हूँ मन हारे, हारे हारे हारे।

22भावार्थ—यह मन सब पर विजय प्राप्त कर लेता है।

23मन पर कोई भी विजय नहीं प्राप्त कर पाता। विश्वामित्र जैसे

24तपस्वी काम से पराभूत होकर मेनका से सम्बन्ध स्थापित कर

25बैठे। क्रोध को न सह सकने के कारण रात्रि में वशिष्ठ की

26हत्या करने के लिये उनके आश्रम पर पहुँचे। पराशर जैसे

27महापुरुष मत्स्यगंधा से प्रेम सम्बन्ध जोड़कर वेदव्यास के जन्म

28का कारण बने। सभी योगी, जपी, तपी एवं ऋषि, मुनि इस मन

29के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेते हैं। स्वर्ग के देवगण

30एवं उनके सम्राट् इन्द्र भी मन को नहीं जीत सके। जिन्होंने

31आठों सिद्धियों एवं नवों निधियों को वश में कर लिया वे भी

32मन को वश में नहीं कर सके। सभी जीवन्मुक्त एवं योगी-जन

33भी मन से पराजय स्वीकार कर लेते हैं। फिर मायाबद्ध जीव

34भला इस चंचल मन को कैसे जीत सकते हैं? मायाधीन होने

35के कारण सभी जीव मन से पराजित हो जाते हैं। श्री कृष्ण की

36कृपा के बिना ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी इस मन पर अधिकार

37नहीं कर सकते। जिन्हें एकमात्र श्री हरि ही प्रिय हैं, केवल वे

38ही इस मन को जीत सकते हैं- जब तुमको श्री हरि प्यारे लगेंगे,

39तब मन तुमसे हार मान लेगा।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version