Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
उभय रूप जग जाना, जाना जाना जाना।
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1उभय रूप जग जाना, जाना जाना जाना।
2इक जग हरि विरचित श्रुति माना,
3इक मन कल्पित जाना, जाना जाना जाना।
4हरि कहँ परम सत्य श्रुति माना,
5जगहुँ सत्य इमि जाना, जाना जाना जाना।
6हरि ते प्रकट जगत श्रुति माना,
7हरि व्यापक जग जाना, जाना जाना जाना।
8हरि में जग का लय श्रुति माना,
9इमि जग मृषा न जाना, जाना जाना जाना।
10जग को सत्य सबै बुध माना,
11पै अनित्य है जाना, जाना जाना जाना।
12जिसने जग में ही सुख माना,
13उसने जग नहिं जाना, जाना जाना जाना।
14इक जग चित्त वासना माना,
15सोइ जग मिथ्या जाना, जाना जाना जाना।
16ज्ञानी जग मन कल्पित माना,
17सत्य ज्ञान नहिं जाना, जाना जाना जाना।
18ज्ञानिहुँ भूख प्यास हित माना,
19माँगि मधुकरी खाना, जाना जाना जाना।
20जिसने हरि में ही सुख माना,
21सोइ “कृपालु” जग जाना, जाना जाना जाना॥
22भावार्थ—संसार के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए
23भक्त कवि कहता है- मैंने भलीभाँति समझ लिया कि दो प्रकार
24का संसार है। एक तो वेद शास्त्र प्रमाणित श्री हरि द्वारा रचित
25संसार दूसरा जीव के मन द्वारा कल्पित संसार। जिस प्रकार वेद
26श्री हरि को त्रिकाल से अतीत परम सत्य स्वरूप बताते हैं।
27उसी प्रकार श्री हरि द्वारा रचित संसार भी सत्य है। जगत् हरि
28से प्रकट हुआ है। एवं श्री हरि इस जगत् के कण-कण में
29व्यापक भी हैं-““ईशावास्य मिद ँ् सर्वं-----””श्री हरि में ही
30सृष्टि का लय भी होता है। इस प्रकार हरि द्वारा प्रकट संसार
31मिथ्या नहीं है। जगत सत्य है इसे सभी विद्वान् स्वीकार करते
32हैं किंतु यह श्री हरि के समान नित्य न होकर अनित्य है।
33जिसने जगत् को सुख स्वरूप माना उसने जगत् के स्वरूप को
34भली प्रकार से समझा नहीं। दूसरा संसार मन की वासना का
35स्वरूप है। वही मिथ्या है। ज्ञानी संसार को मन की कल्पना
36कहते हैं। किंतु यह ज्ञान भी सत्य नहीं है। ज्ञानी को भी भूख
37प्यास का अनुभव होता है जिससे वह भिक्षा भी ग्रहण करता
38है।“कृपालु”के शब्दों में जो श्री हरि को ही सुख स्वरूप
39मानता है वही संसार के स्वरूप को भलीभाँति जान सकता है।