Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
अब यह जाना कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1अब यह जाना कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2प्रेम काम नहिं कबहूँ कान्हा,
3काम प्रेम नहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4प्रेम प्रकाश सूर्य सम कान्हा,
5काम तिमिर सम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6जो तुम्हरोइ सुख चह नित कान्हा,
7शुद्ध प्रेम सोइ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8जो निज सुख ही चह नित कान्हा,
9काम नाम तेहि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10छिन छिन बढ़ै प्रेम नित कान्हा,
11काम घटै नित कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12दे अमरत्व प्रेम नित कान्हा,
13काम मृत्यु दे कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14परम स्वतंत्र प्रेम रह कान्हा,
15जेहि अधीन तुम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16लख चौरासी बंधन कान्हा,
17काम दान कर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18ज्यों रवि अंधकार दोउ कान्हा,
19रहि न सकत सँग कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20त्यों ही प्रेम काम दोउ कान्हा,
21सँग नहिं रहि सक कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22प्रेम “कृपालु” चहत हौँ कान्हा,
23काम न सपनेहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥
24भावार्थ— भक्त श्री कृष्ण को सम्बोधित करते हुए
25कहता है- हे श्री कृष्ण! तुम्हारी कृपा से अब मेरी समझ में
26यह आ गया कि प्रेम काम नहीं हो सकता एवं काम प्रेम नहीं
27बन सकता। महाप्रभु चैतन्य देव ने कहा है-““निजेन्द्रिय सुख
28हेतु कामेर तात्पर्य, कृष्ण सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल””प्रेम सूर्य के
29समान प्रकाशमान है एवं काम अन्धकार स्वरूप है। शुद्ध प्रेमी
30केवल प्रेमास्पद श्री कृष्ण को सुख देना चाहता है। जो अपने
31सुख की कामना रखता है वह तो कामी ही है। प्रेम प्रतिक्षण
32वर्धमान होता है। काम क्षण-क्षण न्यूनता को प्राप्त होता है।
33कामी मृत्यु को एवं प्रेमी अमरत्व को प्राप्त करता है। प्रेम स्वतन्त्र
34है- जो तुम्हें भी अपने आधीन कर लेता है। काम तो चौरासी
35लाख योनियों में भटकाता है। जिस प्रकार सूर्य और अन्धकार
36एक ही स्थान पर नहीं रह सकते उसी प्रकार प्रेम और काम
37एक साथ नहीं रह सकते, तुलसी ने कहा है-
38““जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिँ राम।
39तुलसी कहु कैसे रहें, रवि रजनी एक ठाम।””
40“कृपालु”कहते हैं- श्री कृष्ण मैं तुमसे प्रेम की ही याचना
41करता हूँ। मुझे स्वप्न में भी काम नहीं चाहिये।