Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कैसे कोउ जाने तोहिँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1कैसे कोउ जाने तोहिँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2तू तो महायोगी महाभोगी भी है कान्हा,
3कर्ता भी अकर्ता भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4तू तो अविभक्त विभक्त भी है कान्हा,
5दृश्य भी अदृश्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6तू तो परिच्छिन्न भी है विभु भी है कान्हा,
7निरपेक्ष सापेक्ष कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8तू तो पूर्णकाम भी सकाम भी है कान्हा,
9जन्मा अजन्मा भी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10तू तो भक्तवश भी स्वतंत्र भी है कान्हा,
11भोरा भी चतुर भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12तू तो बद्ध भी है नित्यमुक्त भी है कान्हा,
13दीन भी अदीन भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14तू तो अप्रमेय भी प्रमेय भी है कान्हा,
15गम्य भी अगम्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16तू तो नित्यतृप्त भी है भूखा भी है कान्हा,
17एक भी अनेक भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18तू तो जग में भी जग ते परे भी कान्हा,
19अज्ञ भी है विज्ञ भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
20तू तो निराकार साकार भी है कान्हा,
21निर्गुण सगुण भी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
22तू तो अग्राह्य भी है ग्राह्य भी है कान्हा,
23चिन्त्य भी अचिन्त्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
24तू तो है “कृपालु” अरु न्यायी भी है कान्हा,
25तोको जाने तू ही बस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥
26भावार्थ—भक्त भगवान् से कहता है- हे कृष्ण! तुम्हें
27कोई कैसे जान सकता है। तुम्हारे विरोधी गुणों के कारण तुम्हारे
28कार्य साधारण जीव नहीं समझ सकता। तुम महायोगी भी हो,
29महाभोगी भी हो। द्वारिका में सोलह हजार एक सौ आठ विवाह
30कर प्रत्येक पत्नी से दस पुत्र उत्पन्न किये। इतने बड़े परिवार
31को अपने नेत्रों के समक्ष नष्ट होते देखकर भी तुम विषाद की
32छाया से मुक्त रहे। तुम सृष्टि-रचना, पालन आदि का कार्य
33करते हुए भी अकर्ता ही रहते हो। कारण तुम कर्तृत्व अभिमान
34से रहित हो। तुम एक समय में ही अविभक्त एवं विभक्त भी
35रहते हो। तुम एक ही हो, तुम्हारे खंड नहीं होते। अतः अविभक्त
36हो किन्तु सबके हृदय में अलग अलग बैठकर उनके कर्मों के
37दृष्टा बने रहते हो। यह रूप विभक्त सा जान पड़ता है। भक्ति
38और श्रद्धा के नेत्रों से ही तुम्हारा दर्शन होता है, अतः तुम दृश्य
39हो किन्तु श्रद्धारहित अभक्त के लिये तुम अदृश्य ही रहते हो।
40तुम एकदेशीय भी हो साथ ही व्यापक भी हो। तुम्हें किसी की
41अपेक्षा नहीं इसलिये निरपेक्ष हो किंतु भक्त जनों की अपेक्षा
42करते हो, अतः सापेक्ष भी हो। तुम पूर्णकाम हो किन्तु भक्तों
43की इच्छा पूर्ण करने के लिये सकाम बन जाते हो।““भगवानपि
44ता रात्रिः-----।””वेद कहता है ब्रह्म अजन्मा है किंतु पुनः
45कहता है वह अनेक प्रकार से जन्म भी लेता है।““अजायमानो
46बहुधा विजायते।””अतः तुम एक समय में जन्मा और अजन्मा
47दोनों ही रूप से रहते हो। तुम अपने भक्तों के वश में हो““अहं
48भक्त पराधीनो””किंतु सर्वथा स्वतंत्र भी हो।“परम स्वतन्त्र न सिर
49पर कोई।”भोले भाले भक्तों के लिये तुम भी भोले भाले हो।
50चतुरों के लिये तुम महाचतुर हो। तुम बद्ध भी हो। यशोदा ने
51तुम्हें ऊखल से बाँधकर “दामोदर” संज्ञा प्रदान की। भक्तों के
52प्रेम बंधन में तो सदा बँधे रहते हो परन्तु स्वभावतः तुम सदा
53मुक्त ही हो। अभिमानगलित हो गया है जिनका, ऐसे भक्तों के
54समक्ष दीन बनकर उनकी दासता करते हो। वैसे तो तुम सर्वथा
55अदीन ही हो। तुम्हें प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इसलिये
56अप्रमेय हो किंतु भक्ति शास्त्र तुम्हें प्रमाणित भी करते हैं अतः
57प्रमेय भी हो। श्रद्धा और विश्वास द्वारा जीव तुम्हें प्राप्त कर
58लेता है। नास्तिक के लिये तुम सर्वथा अगम्य हो तुम पूर्णकाम
59होने के कारण स्वभावतः तृप्त हो। भक्तों द्वारा निवेदित सूखा
60साग, केले के छिलके, जूठे बेर खा लेते हो, अतः भूखे भी हो।
61तुम एक हो परन्तु महारास में असंख्य गोपियों के लिये असंख्यों
62रूप धारण कर लेते हो, अतः अनेक भी हो। तुम सम्पूर्ण जगत्
63में व्यापक हो एवं जगत् से अतीत भी हो। सर्वज्ञ होकर नर रूप
64से अल्पज्ञता का नाटक करते हो, अतः तुम अज्ञ और विज्ञ
65दोनों ही हो। रामावतार में जानकी-हरण के अवसर पर-
66““हे खग मृग हे मधुकर स्रेनी तुम देखी सीता मृग नैनी।””
67कहते हुए अल्पज्ञ बनकर साधारण मनुष्यों को भ्रमित किया।
68निराकार रूप से सर्वत्र व्यापक होकर साकार रूप से भी प्रकट
69हो जाते हो। तुम प्राकृत गुणों से रहित होने के कारण निर्गुण
70हो। अनन्त दिव्य गुणों-करुणा, प्रेम, आनंद से युक्त होने से
71सगुण भी हो। श्रद्धाहीन मनुष्य द्वारा तुम्हारे दिव्य लीला चरित्र
72आदि सर्वथा अग्राह्य हैं। श्रद्धावान तुम्हें प्राप्त कर लेता हैं, अतः
73तुम अग्राह्य एवं ग्राह्य दोनों ही हो। भक्त अपने भावों में तुम्हारे
74रूप, गुण आदि का अनुभव करते हैं अतः तुम चिंत्य हो। अभक्त
75प्राकृत इन्द्रिय मन, बुद्धि से तुम्हारा चिंतन नहीं कर सकता,
76अतः तुम अचिंत्य भी हो। तुम कृपा भी करते हो न्याय भी।
77भक्तों पर तो सदैव एकमात्र कृपा ही करते हो। ज्ञानी एवं कर्मीं
78को उनके कर्म का फल देकर न्याय करते हो। विरोधी गुणों के
79आश्रय होने के कारण तुम्हें केवल तुम ही जानते हो।