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Dainik Prarthana

Dainik Prarthana — source anthology; see printed contributor credits

वन्दना

Reading 12 of 21 · Source PDF 18–24

1वन्दना

2मत्प्रेयान् राधिकाप्रेयान् मद्धवो राधिकाधवः,

3तस्मादपि गरीयान्यो कृपालुर्मे जगद्गुरुः।

4गुरुं भजति श्रीकृष्णः श्रीकृष्णं भजते गुरुः,

5सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि कृपालुर्मे गुरुर्महान्।

6अनुवाद - मेरे प्रियतम वे हैं, जो कि राधारानी के प्रियतम हैं।

7मेरे स्वामी वे हैं, जो राधारानी के स्वामी हैं। गुरु श्रीकृष्ण का

8भजन करते हैं, एवं श्री कृष्ण गुरु का भजन करते हैं।

9सिद्धान्तानुसार गुरु एवं भगवान् में कोई अन्तर नहीं है। फिर भी

10शास्त्रों ने गुरु को ही ऊँचा स्थान दिया है।

11यस्य साक्षात् भगवति ज्ञानदीपप्रदे गुरौ।

12मर्त्यासद्धीः श्रुतं तस्य सर्वं कुंजरशौचवत्॥

13एष वै भगवान् साक्षात् प्रधान पुरुषेश्वरः।

14योगेश्वरैर्विमृग्यांघ्रिर्लोकोऽयं मन्यते नरम्॥

15अनुवाद - सद्गुरु साक्षात् भगवान् हैं। वे हमारे हृदय में ज्ञान का

16दीप जलाते हैं। यदि कोई गुरु में प्राकृत मानव की बुद्धि करता

17है तो उसका साधना करना हाथी के स्नान के समान है। गुरु में

18यह भावना रखनी चाहिए कि वे ही समस्त प्रकृति तथा पुरुष के

19ईश्वर, साक्षात् भगवान् हैं, जिस भगवान् की उपासना बड़े-बड़े

20योगी तथा मुनि लोग करते हैं।

21यमुना निकट तटस्थित वृन्दावन कानने महारम्ये।

22कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरिस्थाप्य॥

23तिष्ठंतं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम्।

24पीताम्बर परिधानं चन्दनकर्पूर लिप्तसर्वांगम्॥

25आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डित श्रवणम्।

26मंदस्मितमुखकमलं सकौस्तुभोदारमणिहारम्॥

27वलयांगुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलंकारान्।

28गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम्॥

29गुंजारवालिकलितं गुंजापुंजान्विते शिरसि।

30भुंजानं सह गोपैः कुंजांतर्वर्तिनं नमत॥

31मन्दारपुष्पवासितमन्दानिल सेवित परानन्दम्।

32मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम्॥

33सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतः परितः।

34सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत॥

35अनुवाद - श्री यमुना जी के तट पर स्थित वृन्दावन की किसी

36अति मनोहर वाटिका में कल्पवृक्ष के नीचे की भूमि पर चरण पर

37चरण रखे श्री कृष्ण बैठे हैं, जो नवीन बादलों के सदृश श्याम

38वर्ण के हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं एवं सारे शरीर में कर्पूर से

39मिश्रित चन्दन का लेप किये हुए हैं। जिनके कर्ण पर्यन्त बड़े-

40बड़े नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल सुशोभित हैं, मुखारविन्द

41मन्द मन्द मुस्करा रहा है। जिनके वक्षस्थल पर कौस्तुभमणियुक्त

42सुन्दर मालायें सुशोभित हो रही हैं। जो अपनी कान्ति को दुगनी

43कर रहे हैं, जिनके गले में वनमाला लटक रही हैं, जिन्होंने अपने

44तेज के प्रभाव से कलिकाल को नष्ट कर दिया है, जिनका

45गुंजारवलि अलंकृत मस्तक गूँजते हुए भौरों से शोभायमान हो

46रहा है। किसी कुंज के भीतर बैठकर ग्वालबालों के साथ भोजन

47करते हुए उन श्रीकृष्ण का स्मरण करो, जो कल्पवृक्ष के फूलों

48की सुगन्ध से युक्त मन्द मन्द वायु से सुशोभित हैं, जो स्वयं

49परमानन्द स्वरूप हैं, जिनके चरणों में, भगवती भागीरथी

50विराजमान हैं। उन परमानन्ददायक श्रीकृष्ण का स्मरण करो,

51जिन्होंने समस्त दिशाओं को सुगन्धित कर रखा है, जो सैकड़ों

52कामधेनु गौओं से घिरे हुए हैं, जो देवताओं के भय को दूर करने

53वाले एवं भयानक राक्षसों को भी भयभीत करने वाले हैं, उन

54यदुनन्दन का स्मरण करो।

55अशरण शरण महाप्रभो!

56अशरण-शरण महाप्रभो, तुम स्वामी हम दास।

57कीजै कृपा कृपालु मम, दीजै गुरु सहवास॥

58हे अशरण को भी शरण देने वाले कृपालु महाप्रभो! आप सबके

59स्वामी हैं और हम आपके नित्य दास हैं। अतः हमें गुरु धाम में

60वास देने की कृपा कीजिये।

61तुम दीनन रखवार हम, अहंकार अवतार।

62अस करु कृपा कृपालु अब, दीन बनूँ सरकार॥

63हे नाथ! आप दीनों की रक्षा करने वाले हैं और हम अहंकार के

64मूर्तिमान अवतार हैं। अतः हे दीनानाथ! ऐसी कृपा कीजिये कि

65मैं दीन बन जाऊँ।

66हौं ऐसो हौं पतित जो, पतित न आपुहिं मान।

67ऐसे पतित विचित्र को, पावन करु तब जान॥

68हे नाथ! मैं ऐसा विचित्र पापात्मा हूँ जो स्वयं को पापी भी

69स्वीकार नहीं करता। अतः हे पतितपावन! ऐसे विलक्षण पापी

70को पावन कर दें तब जानूँगा कि आप वास्तव में पतितपावन हैं।

71सबै भिखारी जगत के, जेतिक नातेदार।

72दिव्य प्रेम आनन्द के, तुम इक साहूकार॥

73संसार के सभी जीव आनन्द के भिखारी हैं और हम अनादिकाल

74से अज्ञान के कारण उन्हीं को अपना नातेदार सम्बन्धी मानकर

75उन्हीं से आनन्द की आशा करते रहे। किन्तु हे नाथ! अब

76आपकी कृपा से मैं यह समझ गया कि एक मात्र “आप ही” मेरे

77हैं और उस दिव्य प्रेमानन्द के दाता एवं धनी भी एकमात्र आप

78ही हैं। अतः हे नाथ! इस भिक्षुक को भी प्रेमानन्द देने की कृपा

79करें।

80धनि गुरु वर धाम निवास सुनो मन,

81पुण्यन पुंज सों पाइये जू।

82बनि दीन प्रपन्न रहो गुरु के,

83नित सेवा सों ताहि रिझाइये जू।

84मन ते हरि को गुरु को सुमिरो,

85रसना सों सदा गुन गाइये जू।

86क्षणभंगुर जीवन जानि मना,

87छनहूँ जनि व्यर्थ गँवाइये जू।

88सब धामन वारो वृन्दावन पै,

89औ वृन्दावन हूँ गुरुधाम पै वारो।

90जो गुरु के पद प्रीति जुरी तो,

91भज्यो चलि आवेगो ब्रह्म बिचारो।

92हैं हरि निर्मल भक्त न को,

93गुरु हैं अधमों को उधारन हारो।

94औरन को गुरु हों या न हों,

95गुरु मेरो “कृपालु” सुभाग हमारो॥

96एक तत्वज्ञ अपने परम प्रिय गुरु धाम की पावन भूमि की महिमा

97के रहस्य को प्रकट करते हुए कहता है हे मन! सुनो, गुरु धाम में

98निवास अनन्त जन्मों के पुण्यों के उदय होने के बाद और सबसे

99महत्वपूर्ण कारण गुरु देव की अकारण करुणा के परिणाम

100स्वरूप प्राप्त होता है। अतः इस सौभाग्य को हृदय से स्वीकार

101करते हुए अत्यन्त दीनतापूर्वक एवं दास्य भाव को हृदय में धारण

102करते हुए गुरु देव को अपने तन-मन-धन की सेवा द्वारा प्रसन्न

103करना ही तुम्हारा एक मात्र धर्म एवं कर्त्तव्य है।

104गीतोक्ति के अनुसार भी-

105तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

106उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

107अर्थात् उस ईश्वर तत्त्व को जानने के लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ

108महापुरुष की आवश्यकता है, जिसके शरण होकर सेवा पूर्वक

109जिज्ञासु बनकर “ही” परमतत्त्व का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता

110है।

111इतना ही नहीं हरि एवं गुरु में अभेद मानकर सदा सर्वदा उनका

112मन से स्मरण एवं जिह्वा से गुणगान करते रहना है।

113जीवन की क्षण भंगुरता का विशेष ध्यान रखते हुए एक क्षण भी

114व्यर्थ नहीं जाने देना है।

115हे मन! सभी धामों में शिरोमणि वृन्दावन धाम है; किन्तु मैं

116वृन्दावन धाम को भी गुरु धाम पर न्यौछावर करता हूँ। यदि

117गुरु देव के चरण-कमलों में तेरी प्रीति हो जायेगी तो फिर

118सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण भी भागे चले आयेंगे, शीघ्र कृपा

119करेंगे। भागवत के अनुसार अहं भक्त पराधीनो।

120भगवान् तो निर्मल भक्तों का साथ देते हैं; किन्तु एकमात्र गुरु देव

121ही अधमजनों का उद्धार करने वाले हैं।

122अन्त में बड़ी आशा और विश्वास के साथ शरणागत कहता है

123कि और किसी के गुरु देव हों या न हों, किन्तु मेरे गुरु जगद्गुरु

124कृपालु हैं यह मेरा अत्यधिक सौभाग्य है। मेरे गुरु देव तो

125वास्तविकता के साथ-साथ नाम से भी कृपालु है।

Hindi and Sanskrit daily-prayer anthology, transcribed in its printed section order. It includes scriptural passages and selections by other saints; the title-page credit does not establish sole authorship of every passage. No separate English edition is inferred. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : मई 2010. Publisher: राधा गोविन्द समिति.

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