# वन्दना

Dainik Prarthana — source anthology; see printed contributor credits

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Book: Dainik Prarthana
Source edition: 4; SHA-256 efa1fda0ebdbedc1265f1f1b7c033c024eec587667d9841415565a49267466cc
Source PDF pages: 18–24



<a id="line-1"></a>वन्दना

<a id="line-2"></a>मत्प्रेयान् राधिकाप्रेयान् मद्धवो राधिकाधवः,  
<a id="line-3"></a>तस्मादपि गरीयान्यो कृपालुर्मे जगद्गुरुः।  
<a id="line-4"></a>गुरुं भजति श्रीकृष्णः श्रीकृष्णं भजते गुरुः,  
<a id="line-5"></a>सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि कृपालुर्मे गुरुर्महान्।

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<a id="line-6"></a>अनुवाद - मेरे प्रियतम वे हैं, जो कि राधारानी के प्रियतम हैं।  
<a id="line-7"></a>मेरे स्वामी वे हैं, जो राधारानी के स्वामी हैं। गुरु श्रीकृष्ण का  
<a id="line-8"></a>भजन करते हैं, एवं श्री कृष्ण गुरु का भजन करते हैं।  
<a id="line-9"></a>सिद्धान्तानुसार गुरु एवं भगवान् में कोई अन्तर नहीं है। फिर भी  
<a id="line-10"></a>शास्त्रों ने गुरु को ही ऊँचा स्थान दिया है।

<a id="line-11"></a>यस्य साक्षात् भगवति ज्ञानदीपप्रदे गुरौ।  
<a id="line-12"></a>मर्त्यासद्धीः श्रुतं तस्य सर्वं कुंजरशौचवत्॥  
<a id="line-13"></a>एष वै भगवान् साक्षात् प्रधान पुरुषेश्वरः।  
<a id="line-14"></a>योगेश्वरैर्विमृग्यांघ्रिर्लोकोऽयं मन्यते नरम्॥

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<a id="line-15"></a>अनुवाद - सद्गुरु साक्षात् भगवान् हैं। वे हमारे हृदय में ज्ञान का  
<a id="line-16"></a>दीप जलाते हैं। यदि कोई गुरु में प्राकृत मानव की बुद्धि करता  
<a id="line-17"></a>है तो उसका साधना करना हाथी के स्नान के समान है। गुरु में  
<a id="line-18"></a>यह भावना रखनी चाहिए कि वे ही समस्त प्रकृति तथा पुरुष के

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<a id="line-19"></a>ईश्वर, साक्षात् भगवान् हैं, जिस भगवान् की उपासना बड़े-बड़े  
<a id="line-20"></a>योगी तथा मुनि लोग करते हैं।

<a id="line-21"></a>यमुना निकट तटस्थित वृन्दावन कानने महारम्ये।  
<a id="line-22"></a>कल्पद्रुमतलभूमौ चरणं चरणोपरिस्थाप्य॥  
<a id="line-23"></a>तिष्ठंतं घननीलं स्वतेजसा भासयन्तमिह विश्वम्।  
<a id="line-24"></a>पीताम्बर परिधानं चन्दनकर्पूर लिप्तसर्वांगम्॥  
<a id="line-25"></a>आकर्णपूर्णनेत्रं कुण्डलयुगमण्डित श्रवणम्।  
<a id="line-26"></a>मंदस्मितमुखकमलं सकौस्तुभोदारमणिहारम्॥  
<a id="line-27"></a>वलयांगुलीयकाद्यानुज्ज्वलयन्तं स्वलंकारान्।  
<a id="line-28"></a>गलविलुलितवनमालं स्वतेजसापास्तकलिकालम्॥  
<a id="line-29"></a>गुंजारवालिकलितं गुंजापुंजान्विते शिरसि।  
<a id="line-30"></a>भुंजानं सह गोपैः कुंजांतर्वर्तिनं नमत॥  
<a id="line-31"></a>मन्दारपुष्पवासितमन्दानिल सेवित परानन्दम्।  
<a id="line-32"></a>मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम्॥  
<a id="line-33"></a>सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतः परितः।  
<a id="line-34"></a>सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत॥

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<a id="line-35"></a>अनुवाद - श्री यमुना जी के तट पर स्थित वृन्दावन की किसी  
<a id="line-36"></a>अति मनोहर वाटिका में कल्पवृक्ष के नीचे की भूमि पर चरण पर  
<a id="line-37"></a>चरण रखे श्री कृष्ण बैठे हैं, जो नवीन बादलों के सदृश श्याम  
<a id="line-38"></a>वर्ण के हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं एवं सारे शरीर में कर्पूर से

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<a id="line-39"></a>मिश्रित चन्दन का लेप किये हुए हैं। जिनके कर्ण पर्यन्त बड़े-  
<a id="line-40"></a>बड़े नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल सुशोभित हैं, मुखारविन्द  
<a id="line-41"></a>मन्द मन्द मुस्करा रहा है। जिनके वक्षस्थल पर कौस्तुभमणियुक्त  
<a id="line-42"></a>सुन्दर मालायें सुशोभित हो रही हैं। जो अपनी कान्ति को दुगनी  
<a id="line-43"></a>कर रहे हैं, जिनके गले में वनमाला लटक रही हैं, जिन्होंने अपने  
<a id="line-44"></a>तेज के प्रभाव से कलिकाल को नष्ट कर दिया है, जिनका  
<a id="line-45"></a>गुंजारवलि अलंकृत मस्तक गूँजते हुए भौरों से शोभायमान हो  
<a id="line-46"></a>रहा है। किसी कुंज के भीतर बैठकर ग्वालबालों के साथ भोजन  
<a id="line-47"></a>करते हुए उन श्रीकृष्ण का स्मरण करो, जो कल्पवृक्ष के फूलों  
<a id="line-48"></a>की सुगन्ध से युक्त मन्द मन्द वायु से सुशोभित हैं, जो स्वयं  
<a id="line-49"></a>परमानन्द स्वरूप हैं, जिनके चरणों में, भगवती भागीरथी  
<a id="line-50"></a>विराजमान हैं। उन परमानन्ददायक श्रीकृष्ण का स्मरण करो,  
<a id="line-51"></a>जिन्होंने समस्त दिशाओं को सुगन्धित कर रखा है, जो सैकड़ों  
<a id="line-52"></a>कामधेनु गौओं से घिरे हुए हैं, जो देवताओं के भय को दूर करने  
<a id="line-53"></a>वाले एवं भयानक राक्षसों को भी भयभीत करने वाले हैं, उन  
<a id="line-54"></a>यदुनन्दन का स्मरण करो।

<a id="line-55"></a>अशरण शरण महाप्रभो!

<a id="line-56"></a>अशरण-शरण महाप्रभो, तुम स्वामी हम दास।  
<a id="line-57"></a>कीजै कृपा कृपालु मम, दीजै गुरु सहवास॥

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<a id="line-58"></a>हे अशरण को भी शरण देने वाले कृपालु महाप्रभो! आप सबके  
<a id="line-59"></a>स्वामी हैं और हम आपके नित्य दास हैं। अतः हमें गुरु धाम में  
<a id="line-60"></a>वास देने की कृपा कीजिये।

<a id="line-61"></a>तुम दीनन रखवार हम, अहंकार अवतार।  
<a id="line-62"></a>अस करु कृपा कृपालु अब, दीन बनूँ सरकार॥

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<a id="line-63"></a>हे नाथ! आप दीनों की रक्षा करने वाले हैं और हम अहंकार के  
<a id="line-64"></a>मूर्तिमान अवतार हैं। अतः हे दीनानाथ! ऐसी कृपा कीजिये कि  
<a id="line-65"></a>मैं दीन बन जाऊँ।

<a id="line-66"></a>हौं ऐसो हौं पतित जो, पतित न आपुहिं मान।  
<a id="line-67"></a>ऐसे पतित विचित्र को, पावन करु तब जान॥

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<a id="line-68"></a>हे नाथ! मैं ऐसा विचित्र पापात्मा हूँ जो स्वयं को पापी भी  
<a id="line-69"></a>स्वीकार नहीं करता। अतः हे पतितपावन! ऐसे विलक्षण पापी  
<a id="line-70"></a>को पावन कर दें तब जानूँगा कि आप वास्तव में पतितपावन हैं।

<a id="line-71"></a>सबै भिखारी जगत के, जेतिक नातेदार।  
<a id="line-72"></a>दिव्य प्रेम आनन्द के, तुम इक साहूकार॥

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<a id="line-73"></a>संसार के सभी जीव आनन्द के भिखारी हैं और हम अनादिकाल  
<a id="line-74"></a>से अज्ञान के कारण उन्हीं को अपना नातेदार सम्बन्धी मानकर  
<a id="line-75"></a>उन्हीं से आनन्द की आशा करते रहे। किन्तु हे नाथ! अब  
<a id="line-76"></a>आपकी कृपा से मैं यह समझ गया कि एक मात्र “आप ही” मेरे  
<a id="line-77"></a>हैं और उस दिव्य प्रेमानन्द के दाता एवं धनी भी एकमात्र आप

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<a id="line-78"></a>ही हैं। अतः हे नाथ! इस भिक्षुक को भी प्रेमानन्द देने की कृपा  
<a id="line-79"></a>करें।

<a id="line-80"></a>धनि गुरु वर धाम निवास सुनो मन,  
<a id="line-81"></a>पुण्यन पुंज सों पाइये जू।  
<a id="line-82"></a>बनि दीन प्रपन्न रहो गुरु के,  
<a id="line-83"></a>नित सेवा सों ताहि रिझाइये जू।  
<a id="line-84"></a>मन ते हरि को गुरु को सुमिरो,  
<a id="line-85"></a>रसना सों सदा गुन गाइये जू।  
<a id="line-86"></a>क्षणभंगुर जीवन जानि मना,  
<a id="line-87"></a>छनहूँ जनि व्यर्थ गँवाइये जू।  
<a id="line-88"></a>सब धामन वारो वृन्दावन पै,  
<a id="line-89"></a>औ वृन्दावन हूँ गुरुधाम पै वारो।  
<a id="line-90"></a>जो गुरु के पद प्रीति जुरी तो,  
<a id="line-91"></a>भज्यो चलि आवेगो ब्रह्म बिचारो।  
<a id="line-92"></a>हैं हरि निर्मल भक्त न को,  
<a id="line-93"></a>गुरु हैं अधमों को उधारन हारो।  
<a id="line-94"></a>औरन को गुरु हों या न हों,  
<a id="line-95"></a>गुरु मेरो “कृपालु” सुभाग हमारो॥

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<a id="line-96"></a>एक तत्वज्ञ अपने परम प्रिय गुरु धाम की पावन भूमि की महिमा  
<a id="line-97"></a>के रहस्य को प्रकट करते हुए कहता है हे मन! सुनो, गुरु धाम में  
<a id="line-98"></a>निवास अनन्त जन्मों के पुण्यों के उदय होने के बाद और सबसे  
<a id="line-99"></a>महत्वपूर्ण कारण गुरु देव की अकारण करुणा के परिणाम

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<a id="line-100"></a>स्वरूप प्राप्त होता है। अतः इस सौभाग्य को हृदय से स्वीकार  
<a id="line-101"></a>करते हुए अत्यन्त दीनतापूर्वक एवं दास्य भाव को हृदय में धारण  
<a id="line-102"></a>करते हुए गुरु देव को अपने तन-मन-धन की सेवा द्वारा प्रसन्न  
<a id="line-103"></a>करना ही तुम्हारा एक मात्र धर्म एवं कर्त्तव्य है।  
<a id="line-104"></a>गीतोक्ति के अनुसार भी-

<a id="line-105"></a>तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।  
<a id="line-106"></a>उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

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<a id="line-107"></a>अर्थात् उस ईश्वर तत्त्व को जानने के लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ  
<a id="line-108"></a>महापुरुष की आवश्यकता है, जिसके शरण होकर सेवा पूर्वक  
<a id="line-109"></a>जिज्ञासु बनकर “ही” परमतत्त्व का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता  
<a id="line-110"></a>है।  
<a id="line-111"></a>इतना ही नहीं हरि एवं गुरु में अभेद मानकर सदा सर्वदा उनका  
<a id="line-112"></a>मन से स्मरण एवं जिह्वा से गुणगान करते रहना है।  
<a id="line-113"></a>जीवन की क्षण भंगुरता का विशेष ध्यान रखते हुए एक क्षण भी  
<a id="line-114"></a>व्यर्थ नहीं जाने देना है।  
<a id="line-115"></a>हे मन! सभी धामों में शिरोमणि वृन्दावन धाम है; किन्तु मैं  
<a id="line-116"></a>वृन्दावन धाम को भी गुरु धाम पर न्यौछावर करता हूँ। यदि  
<a id="line-117"></a>गुरु देव के चरण-कमलों में तेरी प्रीति हो जायेगी तो फिर

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<a id="line-118"></a>सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्ण भी भागे चले आयेंगे, शीघ्र कृपा  
<a id="line-119"></a>करेंगे। भागवत के अनुसार अहं भक्त पराधीनो।  
<a id="line-120"></a>भगवान् तो निर्मल भक्तों का साथ देते हैं; किन्तु एकमात्र गुरु देव  
<a id="line-121"></a>ही अधमजनों का उद्धार करने वाले हैं।  
<a id="line-122"></a>अन्त में बड़ी आशा और विश्वास के साथ शरणागत कहता है  
<a id="line-123"></a>कि और किसी के गुरु देव हों या न हों, किन्तु मेरे गुरु जगद्गुरु  
<a id="line-124"></a>कृपालु हैं यह मेरा अत्यधिक सौभाग्य है। मेरे गुरु देव तो  
<a id="line-125"></a>वास्तविकता के साथ-साथ नाम से भी कृपालु है।

Hindi and Sanskrit daily-prayer anthology, transcribed in its printed section order. It includes scriptural passages and selections by other saints; the title-page credit does not establish sole authorship of every passage. No separate English edition is inferred. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : मई 2010. Publisher: राधा गोविन्द समिति.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
