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RADHEY RADHEY

प्रकीर्ण-माधुरी · पद 22

सरस किशोरी, वयस कि थोरी, रति रस बोरी,

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sarasa kishorī, vayasa ki thorī, rati-rasa-borī,

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सरस किशोरी, वयस कि थोरी, रति रस बोरी,

2कीजै कृपा की कोर।

3साधन-हीन, दीन मैं राधे,

4तुम करुणामइ प्रेम-अगाधे,

5काके द्वारे, जाय पुकारे, कौन निहारे,

6दीन दुखी की ओर।

7करत अघन नहिं नेकु अघाऊँ,

8भरत उदर ज्यों शूकर धावूँ,

9करि बरजोरी, लखि निज ओरी, तुम बिनु मोरी,

10कौन सुधारे दोर।

11भलो बुरो जैसो हूँ तिहारो,

12तुम बिनु कोउ न हितू हमारो,

13भानुदुलारी, सुधि लो हमारी, शरण तिहारी,

14हौं पतितन सिरमोर।

15गोपी-प्रेम की भिक्षा दीजै,

16कैसेहुँ मोहिं अपनी करि लीजै,

17तव गुन गावत, दिवस बितावत, दृग झरि लावत,

18ह्वैहौं प्रेम - विभोर।

19पाय तिहारो प्रेम किशोरी!,

20छके प्रेमरस ब्रज की खोरी,

21गति गजगामिनि, छवि अभिरामिनि, लखि निज स्वामिनि,

22बने “कृपालु” चकोर॥

हिन्दी भावार्थ

हे प्रेमरस से युक्त किशोरी जी! हे किशोर-अवस्था वाली राधिके! हे प्रेमरस में सराबोर वृषभानुदुलारी! मेरे ऊपर भी कृपा की दृष्टि करो। हे किशोरी जी! मैं समस्त साधनों से रहित एवं अकिंचन हूँ और तुम अगाध-प्रेम वाली अकारण-करुण हो, फिर हम तुम्हें छोड़कर किसके यहाँ अपना दुःख सुनाने जायें? यदि जायें भी तो मुझ सरीखे अधम की ओर कौन देखेगा? हे किशोरी जी! निरन्तर पापों को करते हुए मेरा पेट कभी नहीं भरता एवं शूकर की भाँति सदा भटकता हुआ विषय रूपी विष्ठा को ही खोजा करता हूँ। हे किशोरी जी! तुम्हारे बिना दूसरा कौन है जो अपनी अकारण कृपा से बरबस मेरी बिगड़ी बना दे। हे वृषभानुनंदिनी! मैं भला-बुरा जैसा भी हूँ तुम्हारा ही तो हूँ। तुम्हारे बिना मेरा हितैषी दूसरा है ही कौन? हे भानुदुलारी! यद्यपि हम पतितों के सरदार हैं फिर भी अब तुम्हारी शरण में आ गये हैं। हमारे ऊपर कृपा करो। हे रासेश्वरी! मुझे किसी प्रकार भी गोपी-प्रेम की भीख देकर अपनी बना लो जिससे मैं तुम्हारे प्रेम में पागल होकर, तुम्हारे गुणों को गाते हुए एवं आँखों से आँसू बहाते हुए अपना जीवन व्यतीत करूँ। हे किशोरी जी! तुमसे प्रेम प्राप्त करके प्रेम-रस में विभोर होकर मैं ब्रज की गली-गली में दीवाना बनकर डोला करूँ। सुन्दरता से भी अधिक सुन्दर, मतवाले हाथी के समान चाल वाली अपनी स्वामिनी को देखकर 'कृपालु' कहते हैं कि मेरी आँखें कब चकोर के समान रूपमाधुरी का पान करेंगी?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 921,920