प्रकीर्ण-माधुरी · पद 21
श्री राधे हमारी सरकार, फिकिर मोहिं काहे की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe hamārī sarakāra, phikira mohiṁ kāhe kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधे हमारी सरकार, फिकिर मोहिं काहे की।
2हित अधम उधारन देह धरें,
3बिनु कारन दीनन नेह करें,
4जब ऐसी दया दरबार, फिकिर मोहिं काहे की।
5टुक निज-जन क्रन्दन सुनि पावें,
6तजि श्यामहुँ निज जन पहँ धावें,
7जब ऐसी सरल सुकुमार, फिकिर मोहिं काहे की।
8भृकुटी नित तकत ब्रह्म जाकी,
9ताकी शरणाई डर काकी,
10जब ऐसी हमारी रखवार, फिकिर मोहिं काहे की।
11जो आरत"मम स्वामिनि!"भाखै,
12तेहि पुतरिन सम आँखिन राखै,
13जब ऐसी “कृपालु” रिझवार, फिकिर मोहिं काहे की॥
हिन्दी भावार्थ
जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी हैं तब मुझे किस बात की चिन्ता है? जो पतितों के उद्धार के लिए ही अवतार लेती हैं एवं अकारण ही दीनों से प्रेम करती हैं। जब हमारी स्वामिनी के दरबार में इतनी अपार दया है, तब मुझे किस बात की चिन्ता है। हमारी स्वामिनी जी अपने शरणागतों की थोड़ी भी करुण-पुकार जब सुन पाती हैं, तब अपने प्राणेश्वर श्यामसुन्दर को भी छोड़कर अपने जन के पास तत्क्षण अपनी सुधि बुधि भूलकर दौड़ आती हैं। जब हमारी किशोरी जी इतनी सुकुमार और सरल स्वभाव की हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है। ब्रह्म श्रीकृष्ण भी जिनकी भौंहें देखते रहते हैं अर्थात् प्यारे श्यामसुन्दर भी जिनके संकेत से चलते हैं, उनकी शरण में जाकर फिर किसका भय है। जब ऐसी स्वामिनी जी हमारी रक्षा करने वाली हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है। जो शरणागत आर्त होकर दृढ़ निष्ठापूर्वक 'मेरी स्वामिनी जी! ऐसा कह देता है, उसे स्वामिनी जी अपनी आँखों में पुतली के समान रखती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जब हमारी स्वामिनी जी शरणागत से इतना प्यार करती हैं तब मुझे किस बात की चिन्ता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 923,922