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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 19

श्री राधे रानी! अब की लेहु अपनाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī! abakī lehu apanāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्री राधे रानी! अब की लेहु अपनाय।

2माँगत भीख क्षमा की राधे! तुम बिनु रह्यो न जाय।

3जाहु पिया! तुम्हरी बातन महँ, अब राधे नहिं आय।

4कहाँ जाउँ राधे! अब, इमि कहि, गह्यो चरण अकुलाय।

5यह पिय! चंद्रावलि-पद नहिं जेहि, लियो अंक लिपटाय।

6झिटकि बैठि मुख मोरि मानिनी, पिय अँसुवन झरि लाय।

7कह “कृपालु” मानिनि! ये हारे, अपने सरल सुभाय॥

हिन्दी भावार्थ

श्रीश्यामसुन्दर कहते हैं कि हे किशोरी जी! मै तुमसे क्षमा की भीख माँग रहा हूँ। मुझे क्षमा कर दो। तुम्हारे बिन अब रहा नहीं जाता, अतएव अबकी बार तो अपना ही लो इतना कहकर लाल जी'ने किशोरी जी के चरणों को पकड लिया, एवं रोने लगे। (चरण पकड़ने का संकेत यह है कि गे इन्हीं चरणों में तो रहता हूँ, अन्यत्र कहाँ जाऊँ?) किशोरी जी अपने पैरों को हटाती हुई व्यंग्य भरे शब्दों में कहती हैं कि है प्रियतम! यह चन्द्रावलि का चरण नहीं जिसे सदा अपने हृदय से लगाया करते हो। ऐसा कहकर किशोरी जी प्रियतम को झटककर मुख फेरते हुए पृथक जा बैठी, प्रियतम इसी अवस्था में आँसू बहाते रहे। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी, इनका कोई दोष नहीं है, ये तो अपने सरल स्वभाव से हारे हुए हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 637