मान-माधुरी · पद 18
""कुँवरि! तू झूठेहिं दोष लगाय""।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari! tū jhūṭhehiṁ dosha lagāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1""कुँवरि! तू झूठेहिं दोष लगाय""।
2सुनु मानिनि! सब बात बताऊँ, साँच, न बात बनाय।
3कालि सखिन मिलि नवल-कुंज महँ, ललितहिं दई बिठाय।
4मोते कहीं चलहु कुंजन बिच, राधे तोय बुलाय।
5हौं भोरो कछु भेद न जान्यों, जानि तोहिं गयों धाय।
6गहन-तिमिर पुनि घूँघट याते, कैसेहुँ मुख न लखाय।
7मोते कह किय मान मानिनी, पद गहि लेहु मनाय।
8हौं याते अकुलाय चरण गहि, दृग अँसुवनि झरि लाय।
9याही ते यह लाल-मिहावरि, गई भाल लिपटाय।
10मोहिं रोवत तजि उठि पुनि ललिता, कुंजन गई दुराय।
11हौं ढूँढत कुंजनि-प्रति हार्यों, कहि-कहि"राधे! हाय"।
12भई प्रभात मरम तब जान्यो, सखियन गयो ठगाय।
13याही ते दृग अति अरुणारे, मुरलिहुँ गई हिराय।
14अपर चिह्न देखति तू जेतिक, सब उन के गुन आय।
15सुनि “कृपालु” हँसि कंठ लगायेहु, मानिनि सखिन रिसाय॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर अपने ललाट में महावर आदि लगः का कारण बताते हुए, एवं अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करः हुए किशोरी जी से कहते हैं।) हे कीर्ति-कुंवरि! तू झूठ-मूठ को ही मेरे ऊपर लांछन लगाती है मैं सर्वथा निर्दोष हूँ। हे मानिनी! सुन, मैं तुझे साफ-साफ स्प प से इसका कारण बताता हूँ, बात बनाना मुझे नहीं आता। से इसका कारण बताता हूँ, बात बनाना मुझे नहीं आता। क्रल सब सखियों ने मिलकर ललिता को अंधेरे में कुंज के बीच में बिठा दिया एवं मुझसे कहा कि हे प्रियतम! चलो तुम्हें कुंज के बरीच में बैठी हुई राधिका जी बुला रही हैं। मैं भोला-भाला इनकी चाल को बिल्कुल भी न समझ सका एवं सचमुच ही एकमात्र तुम्हारे ही लक्ष्य से अत्यन्त शीघ्र उनके कथनानुसार कुंज में चला गया। वहाँ बड़ा अंधेरा था, फिर ललिता ने घूँघट भी काढ़ रखा था, अतएव किसी भी प्रकार मुख न दिखाई पड़ने के कारण मैं न पहचान सका। पश्चात् सखियों ने मुझसे कहा कि किशोरी जी ने मान किया है, इनके चरण पकड़कर इन्हें मना लो, हम सन जाती हैं। मैंने, वास्तव में तुम्हें ही समझकर एवं अत्यन्त ही व्याकुलतापूर्वक, ललिता के चरणों को पकड़कर बहुत आँसू बहाये। इसी से ललिता के चरणों की लाल महावर मेरे ललाट में लग गयी। हे किशोरी जी! इसके पश्चात् मुझे रोता हुआ छोड़कर ललिता किसी कुंज में छिप गयी। मैं 'हा राधे! हा राधे!! कहकर प्रत्येक कुंज में सारी रात ढूँढता फिरा। जब प्रातःकाल हुआ तब मैंने यह रहस्य समझा कि सखियों ने मुझे ठग लिया है। कल रात भर जागने और रोने से ही मेरी आँखें लाल हो गयी है एवं पता नहीं, मेरी मुरली भी कहाँ खो गयी? इसके अतिरिक्त और भी जितने चिह्न तू देखती है, यह सब उन्हीं सखियों की करतूतों के परिणामस्वरूप हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने श्यामसुन्दर के इन वचनों का विश्वास कर हँसकर प्रियतम को गले लगा लिया एवं सखियों पर अत्यन्त क्रोध प्रकट किया। इस प्रकार मान भंग हो गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 635-636