# ""कुँवरि! तू झूठेहिं दोष लगाय""।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0671-M16-K018
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 18
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 315–316

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>""कुँवरि! तू झूठेहिं दोष लगाय""।  
<a id="line-2"></a>सुनु मानिनि! सब बात बताऊँ, साँच, न बात बनाय।  
<a id="line-3"></a>कालि सखिन मिलि नवल-कुंज महँ, ललितहिं दई बिठाय।  
<a id="line-4"></a>मोते कहीं चलहु कुंजन बिच, राधे तोय बुलाय।  
<a id="line-5"></a>हौं भोरो कछु भेद न जान्यों, जानि तोहिं गयों धाय।  
<a id="line-6"></a>गहन-तिमिर पुनि घूँघट याते, कैसेहुँ मुख न लखाय।  
<a id="line-7"></a>मोते कह किय मान मानिनी, पद गहि लेहु मनाय।  
<a id="line-8"></a>हौं याते अकुलाय चरण गहि, दृग अँसुवनि झरि लाय।  
<a id="line-9"></a>याही ते यह लाल-मिहावरि, गई भाल लिपटाय।  
<a id="line-10"></a>मोहिं रोवत तजि उठि पुनि ललिता, कुंजन गई दुराय।  
<a id="line-11"></a>हौं ढूँढत कुंजनि-प्रति हार्यों, कहि-कहि"राधे! हाय"।  
<a id="line-12"></a>भई प्रभात मरम तब जान्यो, सखियन गयो ठगाय।  
<a id="line-13"></a>याही ते दृग अति अरुणारे, मुरलिहुँ गई हिराय।  
<a id="line-14"></a>अपर चिह्न देखति तू जेतिक, सब उन के गुन आय।  
<a id="line-15"></a>सुनि “कृपालु” हँसि कंठ लगायेहु, मानिनि सखिन रिसाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर अपने ललाट में महावर आदि लगः का कारण बताते हुए, एवं अपने-आपको निर्दोष सिद्ध करः हुए किशोरी जी से कहते हैं।) हे कीर्ति-कुंवरि! तू झूठ-मूठ को ही मेरे ऊपर लांछन लगाती है मैं सर्वथा निर्दोष हूँ। हे मानिनी! सुन, मैं तुझे साफ-साफ स्प प से इसका कारण बताता हूँ, बात बनाना मुझे नहीं आता। से इसका कारण बताता हूँ, बात बनाना मुझे नहीं आता। क्रल सब सखियों ने मिलकर ललिता को अंधेरे में कुंज के बीच में बिठा दिया एवं मुझसे कहा कि हे प्रियतम! चलो तुम्हें कुंज के बरीच में बैठी हुई राधिका जी बुला रही हैं। मैं भोला-भाला इनकी चाल को बिल्कुल भी न समझ सका एवं सचमुच ही एकमात्र तुम्हारे ही लक्ष्य से अत्यन्त शीघ्र उनके कथनानुसार कुंज में चला गया। वहाँ बड़ा अंधेरा था, फिर ललिता ने घूँघट भी काढ़ रखा था, अतएव किसी भी प्रकार मुख न दिखाई पड़ने के कारण मैं न पहचान सका। पश्चात् सखियों ने मुझसे कहा कि किशोरी जी ने मान किया है, इनके चरण पकड़कर इन्हें मना लो, हम सन जाती हैं। मैंने, वास्तव में तुम्हें ही समझकर एवं अत्यन्त ही व्याकुलतापूर्वक, ललिता के चरणों को पकड़कर बहुत आँसू बहाये। इसी से ललिता के चरणों की लाल महावर मेरे ललाट में लग गयी। हे किशोरी जी! इसके पश्चात् मुझे रोता हुआ छोड़कर ललिता किसी कुंज में छिप गयी। मैं 'हा राधे! हा राधे!! कहकर प्रत्येक कुंज में सारी रात ढूँढता फिरा। जब प्रातःकाल हुआ तब मैंने यह रहस्य समझा कि सखियों ने मुझे ठग लिया है। कल रात भर जागने और रोने से ही मेरी आँखें लाल हो गयी है एवं पता नहीं, मेरी मुरली भी कहाँ खो गयी? इसके अतिरिक्त और भी जितने चिह्न तू देखती है, यह सब उन्हीं सखियों की करतूतों के परिणामस्वरूप हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने श्यामसुन्दर के इन वचनों का विश्वास कर हँसकर प्रियतम को गले लगा लिया एवं सखियों पर अत्यन्त क्रोध प्रकट किया। इस प्रकार मान भंग हो गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 635-636

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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