लीला-माधुरी · पद 17
बनायो, हरि योगिनि को भेष।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: banāyo, hari yogini ko bhesha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बनायो, हरि योगिनि को भेष।
2भसम लगाय श्याम इमि सोहत, जिमि किय भेष महेश।
3देखत बनत साँचु जनु योगिनि, अंतर नहिं लवलेश।
4लाड़लि-महल चली इकली जहँ, कमलाहूँ न निवेश।
5बातन कछुक बनाय पाइ गयो, महलहुँ माहिं प्रवेश।
6हाव भाव रँग रूप देखि भइ, शंका सखिन विशेष।
7कंठमाल देखन मिस देख्यो, भृगु पद चिह्न रमेश।
8कह “कृपालु” यह छली लली को, आयो छलन ब्रजेश॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर ने योगिनी का भेष बनाया है। सारे शरीर में भस्म लगाये हुए श्यामसुन्दर इस प्रकार शोभित हो रहे हैं जिस प्रकार गोपी भेषधारी भगवान् शंकर। वह छवि देखते ही बनती है। सचमुच ही योगिनी दीखती है। थोड़ा भी अन्तर नहीं दीखता। अस्तु, वह योगिनी किशोरी जी के महल में जहाँ महालक्ष्मी का भी प्रवेश असम्भव है, अकेली ही चली बात बजाने में परम चतुर योगिनी ने बात बनाकर महल के भीतर भी प्रवेश पा लिया। उस योगिनी के हाव, भाव, रूप, रंग आदि श्यामसुन्दर के समान ही देखकर सखियों को विशेष शंका हुई। तत्पश्चात् सखियों ने योगिनी के गले की माला को देखने के बहाने भृगु के चरण का चिह्न देख लिया। बस फिर क्या था, भण्डाफोड़ हो गया। इतने में ही 'कृपालु ने किशोरी जी से कहा कि यह छलिया श्यामसुन्दर तुम्हें छलने आया है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 516-517