लीला-माधुरी · पद 14
नचत ता, थेइ थेइ नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nachata tā, thei thei nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नचत ता, थेइ थेइ नंदकुमार।
2सखियन कहत"ततत ता थेइ थेइ", मंजु निकुंज मझार।
3बजत चरन छूम छननन नूपुर, किंकिनि धुनि झनकार।
4हस्तक, मस्तक, कटि, पद, भृकुटिन, भेद दिखाउ निहार।
5बाजत चंग, मृदंग ढोल, ढप, सबै सुरन इक सार।
6पंचम सुर सों कुंज-विहारिणि, गावति राग मलार।
7कबहुँ बिलंबित, कबहुँ मध्य लय, कबहुँक द्रुत लय धार।
8ललितादिक संगीत स्वामिनिहुँ, करत स्वरन विस्तार।
9कहत “कृपालु” सखिन सब"जय हो, जय हो जय बलिहार"॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर सुन्दर लता कुंज में नाच रहे हैं। सखियाँ ततत ता थेइ थेइ''बोल रही हैं। नृत्य में श्यामसुन्दर के चरण कमलों का नूपुर छूम छननन ऐसी ध्वनि कर रहा है साथ ही किंकिणि की मधुर ध्वनि भी हो रही है। हाथ, मस्तक करमर, पैर, भौंह आदि विविध अंगों के द्वारा नृत्य सम्बन्धी अनेक भेद दिखा रहे हैं। मृदंग, चंग, ढोल, ढप आदि अनेक बाह्य एक स्वर में मिले हुए बज रहे हैं। श्री किशोरी जी पंचम स्वर में मल्हार राग गा रही हैं। कभी विलंबित लय के द्वारा कभी मध्य लय के द्वारा एवं कभी द्रुत लय के द्वारा नृत्य एवं गान हो रहा है। संगीत की सिरमौर ललितादिक सखियाँ तान अलाप द्वारा स्वर विस्तार कर रही हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सहस्रों सखियों का समुदाय, "जय हो, जय हो, बलिहार बलिहार'"ऐसा उच्च घोष कर रहा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 513-514