लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 20

धूसरि धूरि भरे हरि आवत।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhūsari, dhūri bhare hari āvata

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धूसरि धूरि भरे हरि आवत।

2मोर मुकुट कटि कछनी काछे, मुरली मधुर बजावत।

3धुनि सुनि वेनु सबै ब्रजबनिता, देखन को जुरि धावत।

4काँधे लकुटि कामरी कारी, लट उरझी मन भावत।

5वत्स-प्रेम रस पूरि सुरभि थन, मेदिनि क्षीर चुवावत।

6सो “कृपालु” झाँकी झाँकन हित, शंभु समाधि भुलावत॥

हिन्दी भावार्थ

(सांयकाल के समय गायों को चराकर लौटते हुए श्रीकृष्ण की अनुपम झाँकी।) गायों के पैरों से उड़ी हुई धूल से युक्त श्रीकृष्ण आ रहे हैं। कमर में सुन्दर काछनी काछे हुए हैं। मुरली बजा रहे हैं। पमस्त ब्रज गोपांगनायें (जो एक क्षण के लिए भी श्रीकृष्ण से केया है।) अत्यन्त आतुर होकर श्यामसुन्दर के दर्शनार्थ अपने रों से भागकर इकट्टी हो गई हैं। लठिया है, दूसरे कंधे पर काला कंबल है, घुंघराले बाल उलझे हुए हठात् मन को मुग्ध कर रहे हैं। के वात्सल्य प्रेम रस में विभोर अपने थनों से पृथ्वी पर स्वाभाविक ही दूध चुआती हुई चली आ रही हैं। हैं कि गायों से युक्त गोपाल की इस बाँकी झाँकी क देखने के लिए भगवान् शंकर भी बरबस अपनी निर्विकल्प समाधि को भूल जाते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 406-407