Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
बलिहार गौर सरकार, जेहि चाकर नंद कुमार।
Reading 103 of 112 · Source no. 91 · Source PDF 189–191
1बलिहार गौर सरकार, जेहि चाकर नंद कुमार।
2विधि हरि हर कर जयकार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
3आनँदघन कीर्तिकुमार, आनँदघन तन सुकुमार।
4तनु दामिनि दुति अनुहार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
5जेहि स्वागत कर रिझवार, लखि पुनि पुनि कह बलिहार।
6पायो न पार श्रुति चार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
7जेहि सँग कोटिन ब्रज नार, सेवत नित भानुदुलार।
8जेहि छवि पर छवि बलिहार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
9जेहि पग धर सिर रिझवार, रिझवत नित नंदकुमार।
10बनि मनिहारिनि लिलिहार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
11धरि अगनित तनु रिझवार, नहिं पायो जाको पार।
12जेहि डर-डर नंदकुमार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
13जेहि पग चापत रिझवार, धर मुकुट चरण सुकुमार।
14जेहि आरति श्याम उतार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
15आगे चल भानुदुलार, उनके पाछे ब्रजनार।
16उनके पाछे रिझवार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
17जेहि कृपा चहत रिझवार, लहि महल टहल बलिहार।
18मुर्छित लखि छवि सुकुमार, सोइ मम वृषभानुदुलार॥
19जेहि तनु बह ब्रज रस धार, जेहि छाया पर रति वार।
20जो प्रेम रूप रस सार, सोइ मम “कृपालु” सुकुमार॥
21भावार्थ—गौरवर्ण वाली श्रीराधा पर मैं बलिहार जाता हूँ।
22श्रीकृष्ण इनकी दासता करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जिसकी
23सदैव ही जय जयकार करते हैं-वे ही वृषभानुदुलारी मेरी स्वामिनी
24हैं। आनन्दघन स्वरूप कीर्ति कुमारी का सुकुमार शरीर भी
25आनन्दघनमय ही है। इनके शरीर का वर्ण बिजली की चमक की
26ही भाँति है। श्रीकृष्ण जिनका स्वागत करने को तत्पर रहते हैं।
27जिन्हें देखकर वे बार-बार बलिहार जाते हैं चारों वेद जिनकी
28महिमा का अन्त नहीं जान सके, वे ही वृषभानुनन्दिनी मेरी स्वामिनी
29हैं। जिनके साथ-साथ सदैव कोटि-कोटि ब्रजगोपियाँ रहती हैं। ये
30निरन्तर इनकी सेवा में रत रहती हैं। जिसकी छवि पर छवि भी
31बलिहार जाती है। वे ही श्रीराधा मेरी स्वामिनी हैं। जिनके चरणों
32में श्रीकृष्ण भी अपना मस्तक रखते हैं श्रीकृष्ण निरन्तर जिन्हें रिझाते
33रहते हैं। श्रीराधा को प्रसन्न करने हेतु श्रीहरि कभी तो मनिहारिनि
34बनते हैं, कभी लिलिहारिनि। असंख्य रूप धारण कर भी श्रीकृष्ण
35ने जिनकी लीला का अन्त नहीं पाया वे ही वृषभानुनन्दिनी मेरी
36स्वामिनी हैं। जिसके भय से श्रीकृष्ण भी भयभीत होते हैं।
37श्यामसुन्दर जिनके चरणों को दबाते रहते हैं। जिनके सुकुमार
38चरणों में अपना मुकुट रखकर श्यामसुन्दर आरती उतारते हैं वे ही
39श्रीराधा मेरी स्वामिनी हैं। आगे-आगे श्रीराधा चलती हैं, उनके पीछे
40ब्रजगोपियाँ तत्पश्चात् श्रीकृष्ण चलते हैं, ऐसी वृषभानुनन्दिनी मेरी
41स्वामिनी हैं। महलों में सेवा-रत रहकर श्रीकृष्ण जिनकी कृपा की
42लालसा रखते हैं। जिनकी रूप माधुरी से आकर्षित मूर्च्छित श्रीकृष्ण
43पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, वे ही श्रीराधा मेरी स्वामिनी हैं। जिनके शरीर
44से निरन्तर ब्रजरस की धारा प्रवाहित होती रहती है। जिनके सुन्दर
45शरीर की छाया पर ही रति को न्यौछावर किया जा सकता है जो
46प्रेम रूप एवं रस की सार-स्वरूपा हैं। श्री कृपालुजी कहते हैं- वे
47ही सुकुमारी राधा मेरी स्वामिनी हैं।