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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

प्रेम सुधा निधि राधे, राधे मेरी राधे।

Reading 97 of 112 · Source no. 85 · Source PDF 180–181

1प्रेम सुधा निधि राधे, राधे मेरी राधे।

2ऐसी रसिक रँगीली राधे,

3गुन गर्वीली राधे, राधे मेरी राधे।

4जेहि लखि रसिक रँगीलो राधे,

5भूले सुधि बुधि राधे, राधे मेरी राधे।

6गिरत मुरलि हरि कर ते राधे,

7लखतहिँ छविनिधि राधे, राधे मेरी राधे।

8गावत मुरलि नाम गुन राधे,

9चैन न छिन बिनु राधे, राधे मेरी राधे।

10मान करति जब कबहूँ राधे,

11ब्रह्म मनावत राधे, राधे मेरी राधे।

12रोवत कहि पुनि पुनि हा राधे,

13चरण पकरि पिय राधे, राधे मेरी राधे।

14पाव रास-रस पिय तब राधे,

15कृपा करति जब राधे, राधे मेरी राधे।

16मुकुट उतारि धरत पद राधे,

17माँगत सेवा राधे, राधे मेरी राधे।

18कर मनुहार सखिन ढिंग राधे,

19दृग जल भरि हरि राधे, राधे मेरी राधे।

20रहिहौं ऋणी सखी तव राधे,

21दिखला दे छवि राधे, राधे मेरी राधे।

22यह “कृपालु” रस जानत राधे,

23ब्रज रस रसिकहिं राधे, राधे मेरी राधे॥

24भावार्थ—हे प्रेमामृत की सिन्धु स्वरूपा श्रीराधे! तुम रसिक

25शेखर श्यामसुंदर के रंग में रंगी हुई हो। अपने दिव्य गुणों से गर्वीली

26बनी हुई राधे! तुम्हें देखकर रसिक रँगीले श्यामसुन्दर भी अपनी

27देह-सुध को विस्मृत कर देते हैं। श्रीकृष्ण की मुरली उनके हाथ

28से खिसक जाती है। मुरली में तुम्हारे नाम एवं गुणों को गाते रहते

29हैं। उन्हें एक क्षण को भी तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता। जब

30कभी तुम मानिनी बनकर प्रियतम से मान करती हो तो ब्रह्म श्रीकृष्ण

31तुम्हारी मनुहार करते हैं। प्रियतम तुम्हारे चरणों को पकड़कर हे

32राधे! कहकर रो पड़ते हैं। राधे! श्रीकृष्ण रास-रस को तभी प्राप्त

33कर सकते हैं, जब तुम कृपा कर उन्हें प्रदान करती हो। वे अपना

34मुकुट उतारकर तुम्हारे चरणों में रख देते हैं। तुम्हारी सेवा प्राप्त

35करने की लालसा प्रकट करते हैं। नेत्रों में जल भरकर श्रीहरि

36सखियों से अनुनय-विनय करते रहते हैं। तुम्हारा दर्शन प्राप्त करने

37के लिये श्रीकृष्ण सखियों के ऋणी बन जाते हैं। श्री कृपालुजी

38कहते हैं- ब्रजरस के रसिक ही इस रस को समझ सकते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version