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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

ब्रज रस अंबुधि राधे, राधे मेरी राधे।

Reading 96 of 112 · Source no. 84 · Source PDF 178–180

1ब्रज रस अंबुधि राधे, राधे मेरी राधे।

2तेरी कृपा पाय रस राधे,

3भये रसिक पिय राधे, राधे मेरी राधे।

4मादन महाभाव तू राधे,

5जेहि वश रह पिय राधे, राधे मेरी राधे।

6तेरी कृपा रसिक सब राधे,

7पाये ब्रजरस राधे, राधे मेरी राधे।

8तेरी बिनु अनुकंपा राधे,

9कोउ न पाव रस राधे, राधे मेरी राधे।

10कमला ने अति तप किय राधे,

11लह्यो न ब्रज रस राधे, राधे मेरी राधे।

12ब्रजरस महिमा ऐसी राधे,

13जेहि रस वश पिय राधे, राधे मेरी राधे।

14पिय भूले भगवत्ता राधे,

15तव ब्रज रस हित राधे, राधे मेरी राधे।

16नाचे नेकु छाछ पर राधे,

17पिय गोपिन ढिग राधे, राधे मेरी राधे।

18परमहंस बनि तरुवर राधे,

19खरे रहत ब्रज राधे, राधे मेरी राधे।

20ब्रज रस सम बैकुंठहुँ राधे,

21रस नहिं भावत राधे, राधे मेरी राधे।

22ब्रज रस हौं “कृपालु” चह राधे,

23देहु कृपा करि राधे, राधे मेरी राधे॥

24भावार्थ—हे ब्रजरस की सागर रूपा श्रीराधे! तुम्हारी कृपा प्राप्त

25कर ही श्यामसुन्दर रसिक शिरोमणि बने। राधे! तुम मादन महाभाव

26रूपा हो, इसी कारण श्री कृष्ण सदा तुम्हारे वशीभूत रहते हैं। तुम्हारी

27कृपा से समस्त रसिकों को ब्रजरस की प्राप्ति हुई। बिना तुम्हारी

28कृपा के किसी को रस की एक बूँद भी प्राप्त नहीं हो सकती।

29महालक्ष्मी ने ब्रज में प्रवेश प्राप्त करने के लिये बहुत तप किया

30किन्तु वे प्राप्त नहीं कर सकीं। ब्रजरस की ऐसी महिमा है कि

31श्रीकृष्ण भी इसी रस के वशीभूत सदैव रहते हैं। राधे! तुम्हारे ब्रजरस

32को प्राप्त करने हेतु श्रीकृष्ण अपनी भगवत्ता को भूलकर ब्रज वासियों

33की चाकरी करते रहे। किंचित् छाछ का लोभ दिखाकर ब्रज-गोपियाँ

34श्रीकृष्ण को नाना प्रकार के नाच नचाती हैं। इसी रस को प्राप्त

35करने के लिये परमहंस-जन वृक्ष बनकर ब्रज में खड़े रहते हैं। ब्रज

36के समान रस तो बैकुण्ठ में भी नहीं है। श्रीकृपालुजी के शब्दों में हे

37राधे! मैं भी तुमसे ब्रजरस की याचना कर रहा हूँ, कृपा कर प्रदान

38करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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